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नमस्कार साथियों आप लोगो को यह जान कर अपार प्रसन्नता होगी कि अब आप सबकी सुविधा के लिये हमारी वेवसाइट www.irajohri.com बन कर तैयार हो गयी है|

अक्सर होता था कि पुरानी पोस्ट ढूँढना चाहो तो मिलती नही थी अब जो पोस्ट चाहो आसानी से मिल जाया करेगी , आप लोगो को शायद याद होगा कि कॉफी समय पहले ‘धर्मयुग ‘ आया करता था और जब हमारी पीढी पैदा भी नही हुई थी यानी धर्मयुग के प्रकाशन की शुरुआत मे इसमे बहुत सुन्दर पेन्टिंगिस छपा करती थी हमारे पूज्य ताऊ जी दिवंगत श्री राजेश्वर दयाल सक्सेना जी ने हृदय से लगा कर बहुत संभाल कर उन चित्रों का संग्रह किया था और अपने जीवन काल मे ही उस संग्रह का एक भाग मुझे सौंप दिया था उनकी मेहनत को याद करते हुये और उनको श्रद्धान्जलि देते हुये उनके बड़े नाती यानी हमारे बेटे शशाँक जौहरी ने बड़े मनोयोग से यह बेबसाइट बनाई है इसमे आपको हमारे द्वारा बना कर पोस्ट किये गये भोजन की श्रृंखला रचनात्मक कार्यों के अलावा हमारे मित्रों के द्वारा पोस्ट की गयी सामग्री भी मिलेगी

भोजन बनाने की कला के बारे मे आज मै जिस मुक़ाम पर खड़ी हूँ उसमे हमारी माँ श्रीमती कमल सक्सेना और सासूमाँ श्रीमती प्रकाशवती जौहरी का बहुत बड़ा योगदान है दोनो ने ही हमे पग पग पर मार्गदर्शित किया हमारी बहन समान जिठानियो नीलम रूबी व मधु जौहरी तथा सहेलियों ( सुनीता ,शालिनी, शशि ,मीरा व सबा ) का भी कम योगदान नही जिनके प्रोत्साहन से मै निरन्तर इस क्षेत्र मे कुछ नया करने की कोशिश करती रहती हूँ और बहुत से साथियों का नाम मै इस लिये नही दे पा रही हूँ कि लिस्ट बहुत लम्बी हो जायेगी जिनके सहयोग से आज यह वेवसाइट बनाने का शुभ प्रयास हुआ है फेसबुक पर हमारे बहुत से साथी हमसे पूछते थे पोस्ट मिल नही रही है आप अपनी वेबसाइट बताइये एसे मे हमे लगा अब समय आ गया है जब वेबसाइट बननी चाहिये हम घर के पुरुष सदस्यों का भी इस विषय मे शुक्रिया अदा करना चाहेंगे जो हमारे द्वारा प्रयोग के तौर पर बनाये गये नये नये व्यन्जनो को बड़ी दिलेरी के साथ अपनी जिव्हा पर स्थान दे कर उस व्यन्जन के स्वाद के बारे मे सही आलोचना करते है
हम अपने साथियों को बताना चाहते है कि अगर आपके पास कोई भी हुनर है तो उसको बेकार ना जाने दीजिये दूसरों को बाँटिये तभी उसका सही उपयोग हो सकता है हमने पाया कि बहुत से बच्चो को पढाई के दौरान घर से दूर रहना पड़ताहै या फिर शादी केबाद गृहस्थी बसाने के बाद जब स्थिरता आती है तो सबसे बड़ी मुश्किल मनपसन्द खाना खाने की होती है बाजार मे कितना भी खा लो तबियत घर मे बने भोजन को चैन के साथ बैठ कर खाने से ही भरती है अक्सर जब हम घर से बाहर किसी रेस्टोरेन्ट मे जाते है तो घर का स्वाद यानी माँ के हाथो से बने भोजन का बचपन वाला स्वाद ढूँढते है हमारे द्वारा प्रकाशित श्रृंखला मे आपको इसी स्वाद के साथ पुरानी पेन्टिंग्स का मजा और घरेलू रचनात्मक कार्यों का मजा मिलेगा
आप सभी की शुभचिन्तिका
इरा जौहरी

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