अलगाव
लघु कथा
अलगाव
बाबू जी की बहुत इच्छा थी कि उनका भी अपना कोई एक घर हो। बचपन मे अनाथ होने व परिवार मे सबसे बड़े होने के कारण ज़िम्मेदारियों का वहन करते हुये अपनी यह इच्छा मन मे ही दबा गये थे अपनी मेहनत से अफ़सर तो बने पर उसूलों के पक्के होने के कारण कभी रिश्वत नही ली वरना जिस सरकारी पद पर वो रहे आज उनके पास भी आलीशान भवन होता ।हाँ उनके चार बेटे थे और अब उनका यही एक सपना था कि सबके पास अपने घर हों । उनके बेटों ने उनकी इच्छा का मान रखा और अपने अपने घर बनवाये ।अब घर बन गये तो सबको जो एक साथ रह रहे थे अलग तो होना ही था ।संयुक्त घर से धीरे धीरे सब अलग होते चले गये । अन्त मे जब छोटी देवरानी जाने लगी तो जिठानी से रहा नही गया बोल पड़ीं हमेशा याद रखना नाख़ून से जब माँस अलग होता है तो दर्द बहुत होता है ।कभी दिल से अलग मत होना ।जिठानी की यह बात देवरानी कभी नहीं भूली और अलग होते हुये भी अक्सर ही मिलने और साथ रहने पँहुच ही जाती है आज बाबूजी दुनिया मे नहीं है बेटों ने उनका सपना भी पूरा किया और सब मिल कर रह भी रहे हैं ।
इरा जौहरी
लघुकथा अलगाव
१७/५/२०१८


