उफान पर नदी
लघुकथा
उफान पर नदी
श्यामला अपने आप में मगन चली जा रही थी।विचारों की उथल पुथल मन में चल रही थी सोंच रही थी कि जो उसने किया ठीक ही किया ।बहुत सह लिया । माँ बाऊ जी की तरह वह अपना जीवन नहीं गुज़ारेगी उसको मौक़ा मिला है तो वह जरूर प्रशिक्षण लेगी । सबके साथ वह भी कपड़े के खिलौने बनाना सीखेगी और संस्था के साथ मिल कर आगे बढ़ेगी।इन मालिकों का क्या बरगद की तरह छाया तो देते है पर पनपने किसी को नही देते अब वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर सबको दिखायेगी।आज उसके मन की नदी उफान पर थी जो सारे बन्धन तोड़ कर कुछ नया करके आगे बढ़ने के लिये तैयार थी ।
इरा जौहरी
७/६/२०१
उफान पर नदी
९/६/२०१८

