छोटकी चच्ची
लघुकथा / छोटकी चच्ची
छोटकी चच्ची के घरां जब भी जाओ उनका रोना उलाहना शुरु हुई जात है ।चच्चा की बुरी आदतन के लिये सबसे अधिक वो अपनी बूढ़ सास को गरिया कर उलाहना देती रहतीं हैं ।अब तो उनका लल्ला भी जवान हो गया है पर उनकी इस आदत पर अब भी उनका कोई क़ाबू नही हैं ।
आज बड़े दिनो बाद वहाँ जाना हुआ।” अरी ओ चच्ची ! का हुई रहा है ?” हमनें आवाज लगाई ।आज भी वो चच्चा की किसी गलती पर जमीन आसमान एक कर रहीँ थी ।यह देख हमनें मुस्कुराते हुये उनसे कहा “चच्ची चच्चा को तो उनकी अम्मा ठीक से सब सिखा पढ़ा नहीं पाईं कम से कम अब तुम अपनें लल्ला को सब ठीक से सिखा पढ़ा देना ।जिससे तुम्हारी बहू को तुम्हारी तरह परेशान ना होना पड़े ।”
यह सुन चच्ची तपाक से बोलीं “सासूमाँ के लल्लो तो हमणों ठोंक पीट कै ठीक कर कै बजावन लायक बनाय लियो ।अब का हमरो लल्लो भी हमहीं ठोंक पीट कै ठीक करैंगे अरे कछु काम तौ बहूराणी भी करिहैं कि नाहीं ।”
उनकी यह प्यार भरी दलील सुन हम मुस्कराये बिना नहीं रह सके ।
इरा जौहरी
मौलिक
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2023413161292085&id=1816103782023025

