जानें कहाँ गये वो दिन !!!!! दूसरा भाग
हमारी दूसरी रचना
बचपन की खट्टी मीठी यादों के बाद हम थोड़ा आगे बढ़ते हैं वैसे तो अपना दिल हमेंशा बचपन में ही खोये रहना चाहता है वो समय ही एसा होता है जिसकी स्मृतियाँ हमेंशा मानसपटल पर छाई ही रहती हैं सुखद बिताये पल सबको बताने से मन खुश रहता है जबकि दुखद पल याद करने पर हमेशा दुख ही देतें इसी बात से याद आया कि एक बार हमने अपने ससुर जी से उसके बचपन की मीठी यादों के बारे मे जब पूँछा तो उनका उत्तर था कि जिसके मामा पिता का बचपन मेंही देहान्त हो गया हो उसके बचपन मे कुछ याद करने लायक नही होता वह जिसके भी पास रहता है वह उसे बोझ ही समझता है इस घटना के बाद कुछ पूँछने की हिम्मत ही नही हुई पर इतना जरूर है मेंरे द्वारा बनाई गयी चीज़ों को देख कर अगर उन्हे कुछ याद आ जाता था तोजरूर उत्साह से बताते थे हाँ तो बात हमारे बीते हुये दिनो की हो रही है तो हम भी वहीं चलते है हमारे जीवन मे एक वह समय था जब हम बच्चे से थोड़ा बड़े हुये हमारे पापा का स्थानांतरण प्रतापगढ से वाराणसी हो गया हम नये परिवेश मे आ गये वाराणसी का पुराना नाम बनारस है आम बोलचाल मे यही ज्यादा चलता है बनारस के पास ही काशी स्थित है जो विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल है जो वहाँ रहे और गंगा ना नहाये यह हो नही सकता तो हम भी कैसे इससे अछूते रहते वहाँ खूब गंगा नहाई अब तो यहाँ लखनऊ मे बस वो यादे ही हमारे साथ हैं और काशी पार राम नगर की नक्कटैया देखने नाव से नदी पार करके पापा के साथ जाना हम कभी नहीं भूल सकते वो समय एसा था बनारस मे किसी इक्का दुक्का घर मे ही टेलीविजन आया था घरों मे रसोई गैस का शुभारम्भ हो चुका था पर घरों मे अँगीठी और चूल्हे पर ही बना भोजन पसन्द किया जाता था आज सोंचती हूँ पापा हम सबको खूब घुमाते जरूर थे पर इसमे हमारी माँ का भी योगदान कम ना था वह झट पट उस जमानें मे भी भोजन तैयार कर लेतीं थी एक तो वो हमेंशा साथ मे बुकनू या मसालेदार नमक जरूर साथ मे रखतीं थी कहीँ भी हम लोगो को भूख लगने पर रोटी पर लगा कर खिला देतींथी आज के युग में तो हर जगह विविधताओं से भरे सुस्वादु व्यन्जन भरे रहते है उसके सामने बुकनू रोटी को तो आज के बच्चे हाथ भी नहीं लगायेंगे अब ना वह सादा जीवन हैऔर ना ही सादा भोजन पसन्द करने वाले लोग एसा तो हम नही करेंगे पर पहले की तुलना मे अब कम है लोगो के दिलो की वो सादगी आज ढूँढने पर भी नहीं मिलती
बात चली है तो एक बात और याद आई बनारस मे बंगाली लोग बहुतायत मे रहतें है उन्हीं मे एक हमारी बाल विधवा दादी जी थीं बचपन में ही आठ साल मे सत्तरसाल के आदमी से उनका विवाह हो गया था और दस वर्ष की आयु मे वो विधवा भी हो गयीं थी हमारे पापा के मित्र की वो रिश्ते मे चाची लगती थी इस नाते हम उनको दादी जी कहते थे वैसे आयु में वो हमारी माँ से कुछ वर्ष ही बड़ी होंगी मेरा एक छोटा भाई भी है हम दोनो भाई बहन को दादी जी बहुत प्यार करती थीं माँ जो हम लोगों के लिये पराठे बनाती थी वो साथ में बड़े शौक से स्वाद ले कर खातीं थी दादी जी के साथ हमारे बचपन के बहुत से क़िस्से जुड़े हुये हैँ वो माँ के पीछे अकेले मे जो हमारा पहली बार पूरा खाना बनाना और चुपके से दादी जी के द्वारा हमारी कड़ी कड़ी रोटियों को देख कर जाना और जब खाना खाते समय पापा की मुँहबोली बहन यानी हमारी मुँहबोली बुआ के बेटे द्वारा हमारी खिल्ली उड़ाना एक एक रोटी का अलग से बखान करना और फिर दादी जी का हँससे हँसते दोहरा हो जाना फिर वापस जा कर अपने घर से रोटियाँ लाना सब कुछ लिखते समय आँखों के सामने घूम रहा है कहाँ इतने अनाड़ी थे हम और आज फेसबुक पर धमाल मचाये हुये हैं रोज ही कुछ ना कुछ बना कर पोस्ट करते ही रहते है अब समय बदल गया है मज़ाक़ उड़ाने वाले चेहरे बदल गये है पर वो दादी जी कहीँ किसी के भी रूप मे नज़र नही आतीं हमे वो दादी जी आज भी बहुत याद आतींहैं जाने कहाँ गये वो दिन
इरा जौहरी



