पलायन
चित्र आधारित लघुकथा
पलायन
इंसान ने ही बनाये ये भवन ऊँची अट्टालिकायें , राकेट , हवाई जहाज़ ,बिजली और हवा से बातें करने वाली गाड़ियाँ जिनका इस्तमाल करके वह नये युग मे ढेर सारी सुविधाओं का उपभोग कर सकता है पर इतना सब करने के बाद भी ऐसा क्यूँ है कि हम इंसानों का ही एक तबक़ा ग़रीबी की रेखा के नीचे जीर्णशीर्ण दशा मे रहनें को मजबूर है सोंच रहा है गाँव से आया मजबूर किसान हरिहर जो अब शहर आ कर एक मज़दूर के रूप में जाना जाता है ।मन में उठ रहे हैं सवाल क्या पेट की भूख शान्त किये बिना यह सब चल पायेंगे फिर हम किसानों को क्यो नही इतना मिल पाता है कि हम अपनी मूलभूत आवश्यकतायें भी पूरी कर सके ।अगर हम जैसे सभी किसान गाँव छोड़ शहर आ जायेंगे तो कौन अन्न उगायेगा और फिर भूखे पेट कैसे होगा इन सबका सृजन ।जितना जरूरी नये नये आविष्कार हैं उतना ही जरूरी हम ग़रीबों का पेट भरना भी है । भूखे तन और रूखे मन से जिन्दगी नही चला करती काश ये सुविधाये हम ग़रीबों के भी नसीब मे होती हाड़ तोड़ मेहनत के बाद हम भी पक्के घरों मे आराम कर पाते काश हमारे गाँव मे जिन्दगी इतनी कठिन ना होती शहरों सी कुछ सुविधायें हमारे गाँवों मे भी होती ।गाँव की जिन्दगी भी कुछ आसान होती तो इस तरह गाँवों से शहरो की तरफ यूँ पलायन ना होता ।
इरा जौहरी
लखनऊ
चित्र आधारित लघुकथा
पलायन
१६/६/२०१८


