बचपन याद आता है
❆ काव्य सृजन – कविता
❆ विषय – बचपन याद आता है
❆ तिथि – 18 जून 2018
❆ वार – सोमवार
अमवा की छाँव तले वो सहेलियों संग गप्पे लड़ाना
फिर मौक़ा पा कर नमक के साथ कच्ची कैरी चबाना
दिन दुपहरी भाग कर घर के पिछवाड़े सहेलियों संग जाना
और पीपल की छइया में वो झूले पर लम्बी पेंगे बढ़ाना
बोल मेरी मछली कितना पानी के बाद घेरा तोड़ कर भाग जाना
और फिर गुज़रे जमाने की वो छिपन छिपाई पकड़म पकड़ाई
दादी नानी की वो किस्से कहानियाँ और पहेली बुझाना
नटखट नादां भोली बन सबकी नाक मे दम करना
सच में वह बचपन याद आता है बहुत जब होती हूँ अकेली
याद आतीं हैं वो बचपन के खेल खिलौने और सखि सहेली
पर अब जब देखा करती नन्हे बच्चो को जूझते अकेलेपन से
बन्द कमरों के घुटते दायरों में आया की गोद मे पलते हुये
सोंचती हूँ कहाँ से लायेंगे वो बिन्दास बचपन
कैसे पायेंगे वो रेत के घरौंदे बनाने का सुख
कहीँ हम इस बढ़ती आधुनिकता के दौर में
बच्चों का स्वभाविक बचपन तो नही छीने ले रहे
कभी कभी सच में बहुत याद आता है वो अल्लढ़ बचपन
वो काग़ज़ की नाव और बारिश के रिमझिम पानी मे नहाना
और माँ की ज़ोरदार डाँट के बाद दादी की गोद में बैठ कर
बुआ के हाथों से गरमगरम अदरक वाली गुड़ की चाय पीना
कहाँ तक लिखूँ अन्त ही नहीं है यादो के क़िस्सों का
बन्द आँखों के सपनों मे सच में वो बचपन याद आता है
इरा जौहरी
लखनऊ
काव्य सृजन – बचपन
१८/६/२०१८
