मुशायरा / उलझन सी जिन्दगी
मुशायरा / उलझी सी जिन्दगी
(१)
खुली किताब तो सभी आसानी से पढ लेते है “इरा”,
उलझी जिन्दगी को सुलझाने का मजा ही कुछ और है।
इरा जौहरी इरा
२)कुछ उलझी सी जिन्दगी मन के आइने में दिखी मुझे बदरंग सी जिन्दगी ,
आ बैठ कुछ पल पास“इरा “के सुलझा तू हर गम रंगीन कर ले जिन्दगी।
इरा जौहरी
४)कछ राज“इरा”सीने मे दफ़्न ही दबाये चले जाना ही अच्छा ,
किताब का हर पन्ना खोल कर सबको पढ़ाया नही जाता ।
इरा जौहरी इरा
(५)
मीठे सपनों के साथ सजी उलझी सी “इरा”कीजिन्दगी ,
बन्द मुट्ठी लाख की खुल जाये तो ख़ाक होती जिन्दगी ।
इरा जौहरी इरा
६)रात हो गयी आधी अब चलो खो जाते हैं सपनों में ,
नयी सुबह के साथ सुलझातें है उलझने जिन्दगी की।
इरा जौहरी इरा
७) उलझनें सुलझाते सुलझाते कहीँ खुद ना उलझ जाना,
(रिश्ते बड़े नाज़ुक होते हैं )
उलझनें से पड़ी बन्द गाँठो को झटके से ना तोड़ देना ।
इरा जौहरी इरा
८) अनचाही सी गाँठें पड़ जातीं हैं जिन्दगी में जो कभी ,
ना सुलझती हैं “इरा”से और ना तोड़ी ही जातीहै ।
इरा जौहरी इरा
(९)तेरी किताब के अनगढ़ खुले पन्नों को पढ़ने की उलझन ,
ज्यों ज्यों सुलझाती गयी”इरा और उलझती चली गयी ।
इरा जौहरी इरा
१०)उलझनों मे अपनी उलझी रहती है “इरा”अक्सर बेख़बर ,
कि कोई तो आ कर सुलझायेगा उलझनों की तदबीर।
इरा जौहरी इरा
११) चालें चलने वाले चाले चला करें अपनी उलझनों में उलझ कर ,
हम तो मस्त पवन के झोंकों से बहे जाते हैं सब सुलझाते हुये ।
इरा जौहरी इरा
१२) जीवन में लातीं हैं “इरा”मुश्किलें उलझनें कई,
सँभलकर चलने वाले यूँ लड़खड़ाया नही करते ।
इरा जौहरी इरा
१३)खेल खेला करे चाहे जितनी जिन्दगी बातों मे उलझा कर ,
हम तो लहरों को भी कर लेतें है पार उलझनें सुलझाकर ।
इरा जौहरी इरा
मुशायरा /उलझन /१३
२९/८/२०१८


