राजनीति
लघुकथा
राजनीति
विश्वविद्यालय में चुनाव की सरगर्मी बढ गयी थी पढ़ने वाले पढाई मे लगे हुये थे और चुनाव प्रचार वाले अपने काम को तेज़ी से अंजाम देने मे लगे हुये थे तभी बस स्टाप पर बस का इन्तजार करते तन्वी की सहेलियों के पास नेताजी साथ एक झुण्ड हाथ जोड़ कर अपनें पक्ष मे वोट देने के लिये कहने आया और साथ ही उसने सबके घरों के पते भी ले लिये कि वोट वाले दिन घर पर गाड़ी भेज देंगे और आप बस हमारे नेता को ही वोट दीजियेगा ।
अभी एक टोली गयी ही थी उनके पास दूर से छात्राओं की एक टोली दिखी उसमे उसकी कक्षा के लोग नजर आ रहे थे ।पास आने पर उसकी सहेली बोली सुनो वो हमारे भइया के मित्र हैं ।सब लोग उन्हीं को वोट देना ।
घर पँहुचने पर माँ से उसनें कहा कल मुझे सुबह ही जाना है वोट देने मेरे नाश्ते पानी की चिन्ता ना करना ।अगले दिन सुबह ही तड़के घर के दरवाज़े पर एक जीप आ खड़ी हुई उसमें बहुत से संगी साथी थे ।सबके संग वह भी विश्वविद्यालय पँहुच गयी ।वहाँ जा कर झटपट वोट देने वालों की पंक्ति मे लग गयी ।गरमगरम पूड़ी और आलू की सब्जी के पैकेट सबको बाँटे जा रहे थे और बताया जा रहा था कि किसको वोट देना है ।
सब मजे से खा पी कर वोट दे आये ।जब नतीजा आया तो पता चला कि सहेली के भाई का दोस्त विजयी हो गया है तो सब उसके पीछे पड़ गये कि हमने तो उसी को वोट दिया था तभी वो जीता और अब तो पार्टी बनती है ।उधर जीत की खुशी मे दोस्त की बहन की सहेलियों मे धाक भी जमानी थी तो शाम को चाऊमीन की पार्टी विश्वविद्यालय के पास के रेस्तरा मे चल रही थी ।
इरा जौहरी
स्वरचित
#२५ लघुकथा/हमारी बारहवीं लघुकथा
३०/९/२०१८

