रोटी
लघुकथा
रोटी
चार बहुओं वाली सासू माँ को बहुयें कोई काम नही करनें देती थी ।यहाँ खास बात यह थी कि सबसे बड़ी बहू जो कहती थी उसका पालन बाकी तीनों बिना किसी ना नुकुर के करतीं थी और उससे छोटी की बात इसी तरह उससे छोटी दोनो और सबसे छोटी बस सबका मुँह निहारती रहती थी जो बड़ी कह दे वही सही क्यों कि शादी के समय उसकी माँ ने उससे कहा था कि तीनों जिठानियों को बड़ी बहन समझना जैसा वो कहे वैसा ही करना ।सार यह कि सभी में बहुत एका था तो सासू माँ ने भी रसोई के बहुत से कार्यों से छुट्टी पा ली थी खास तौर पर रोटी बनाने से ।हर बहू अलग तरह से रोटी बनाती थी और ससुर जी अपनें चारों पोतों के संग रोटियों की विवेचना करते हुये स्वाद ले कर बच्चो के संग भोजन का स्वाद लेते नही अघाते ।हाँ रोटी बनाते समय एक नियम और था कि ससुर जी के खाना खाते समय रोटी सासूमाँ को ही बनानी पड़ती थी तो सब बहुयें हँसती थी कहती क्या हम लोग रोटी नही बना पाते तो ससुर जी भी वैसे ही हँसते हुये जबाब देते कि “जो बात उनकी बनाई रोटी में है वह और कहीं नही आप लोग उनके जैसी रोटी नहीं बना सकती “अब बहुये रोटी बनाते समय कोशिश करतीं कि उनकी रोटी भी सासूमाँ जैसी बन जाये क्योकि यहाँ तो उनके चारो बेटे और पोते भी दादी के हाथों से बनी रोटियों के दीवाने थे ।दादी के हाथ की बनी रोटी की खास बात यह होती थी कि वह आकार में कुछ बड़ी ,हल्की गुदकारी और सबसे खास बात उस पर हाथ की ऊँगलियों की छाप होती थी ।
समय गुज़रा एक बार सासू जी की तबियत खराब हो गयी तब से जो उन्होंने रोटी बनाना बन्द किया तो बन्द ही कर दिया ससुर जी की तबियत भी नासाज़ रहने लगी भूख कम हो गयी जब उनसे कहा गया खाना तो पूरा खाया करिये तो मासूमियत से बोले “क्या करूँ रोटी मे स्वाद ही नही आता ।“बड़ी मुश्किल से बहुयें सासू माँ को एक रोटी बनाने के लिये राज़ी करके रसोई में ले गयीं ।अपनें हाथ से लोई बनाई पर सासू जी से अब रोटी ही नही बिली तो बहुओं ने रोटी बेल दी और सासू माँ से कहा कि अब आप अपनें हाथों बस गर्म तवे पर रोटी पय भर दीजिये ।उनके हाथो से जो रोटी तवे पर पड़ी और फिर जो उस पर उनकी उँगलियों की छाप पड़ी वह रोटी देख कर ससुर जी बोले देखो यह होती है रोटी ।उनके चेहरे की खिली मुस्कान देख कर बहुयें भी मन्द मन्द मुस्करानें लगीं ।
इरा जौहरी
स्वरचित
लघुकथा / रोटी
४/७/२०१८

