लखनऊ से भोपाल की यात्रा
-❆ संस्मरण -लखनऊ से भोपाल की यात्रा
❆ तिथि – 25 सितम्बर 2018
❆ वार – मंगलवार
भाग -१
.
जब भी संस्मरण लिखने की बात आती है मन यादों के गलियारे मे दौड़ने लगता है ।आज कुछ समय पहले की गयी यात्रा के विचार अचानक स्मृतियों के सागर मे गोता लगाने लगे तो सोंचा चलो यही सही ।
तो यह संस्मरण हमारा भोपाल यात्रा का है जहाँ हमारे मामा की नातिन यानी हमारी दीदी की बेटी की शादी थी ।पहले तो हमारा जाने का कोई इरादा नही था पर फिर परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि हम भी साथ मे चल दिये ।हुआ यह कि पहले जाने वालों में सात लोग यानी एक गाड़ी पूरी भर कर भोपाल जा रही थी पर लखनऊ से निकलते ही ड्राइवर के पास उसके किसी अपने की मौत की खबर आ गयी और उसे घर में बुलाया जा रहा था तो उसने आगे जाने से मना कर दिया ऐसे मे सब वापस आ गये अब फिर बेटे ने नया इंतजाम किया अबकी बार जो गाड़ी तय हुई उसमें चार लोग ही जा पाते ।तो बेटे ने कहा चलो हम भी अपनी गाड़ी निकाल लेते है अब आनन फ़ानन मे हम भी अपने घर दौड़े और फटाफट शादी के हिसाब से तैयारी करके सबके संग लग लिये एक सीट खाली जो थी ।
हम सब रात में ही माँ के पास से खाना खा कर निकल पड़े थे ।बेटे के साथ इतनी लम्बी दूरी तय करने का यह हमारा पहला मौक़ा था और हमने इस यात्रा का पूरा लुफ़्त उठाया ।चलती गाड़ीमें बस यही लगता कि रास्ते में कहीँ बेटे को नींद ना आ जाये तो पूरे रास्ते उससे कुछ ना कुछ बोलते ही रहे ।सन्नाटी सड़क पर दौड़ती हुई गाड़ी पर बैठने का अलग ही मजा था और साथ मे भाई भाभी संग बतियाना एक अलग ही ख़ुशनुमा एहसास था कभी दीदी जीजा जी व मौसी संग बैठ कर उनसे बतियाने लगते पूरे रास्ते सफर को जग कर ही गुज़ारा ।रात मे सड़क किनारे पड़ने वाले ढाबे पर रुककर कुछ समय गाड़ी चलाने वालो ने अपने हाथ पैर सीधे किये और हम लोगों ने भी उतर कर रात का नैसर्गिक आनन्द उठाया ।हल्की थकान उतार कर फिर सब आगे की ओर चल दिये सुबह के समय हम लोग जिस ढाबे पर रुके उसके चारों तरफ बहुत ही खूबसूरत खेत खलिहान दिखे दूर खजूर के वृक्षों ने तो हमारा मन ही मोह लिया था ।
सुबह की चाय पी कर हम आगे की यात्रा की ओर बढ चले अब मध्यप्रदेश की छोटी छोटी पहाड़ियों की मनमोहक श्ंखला शुरू हो रही थी सबका आनन्द लेते हुये हम आगे बढ़े जा रहे थे रात भर जागने के बाबजूद नींद कहीँ दूर चली गयी थी ।आगे बढ़ने पर किसी नगर क्षेत्र मे घुसने पर गरमगरम जलेबी व पोहा बनता दिखाई दिया जिसको देखते ही हम समझ गये कि हम मध्यप्रदेश मे प्रवेश कर गये हैं ।सबका आनन्द लेते हुये हमने अपना सफर जारी रखा तभी आगे हम लोगो को सतपुड़ा की पहाड़ियाँ नजर आने लगी और साँची का स्तूप भी दिखने लगा तो शादी के घर मे जाने से पहले उसको देखने का लोभ छोड़ नहीं पाये ।समय बहुत हो रहा था शादी के घर से दीदी के फोन आ रहे थे कि कितनी देर है सबका इंतजार खाने पर हो रहा है सब जल्दी आओ फिर विवाह के कार्यक्रम भी शुरू होने थे ।तो हम सबने दौड़ते भागते सब दर्शन करते हुये खूबसूरत दृश्यों को कैमरे मे क़ैद करते हुये भोपाल शहर मे प्रवेश करते हुये विवाह स्थल पर पँहुचे जहाँ जलपान व भोजन के पश्चात विवाह के कार्यक्रम मे शामिल हो कर रात में फिर एक बार भोपाल की सड़के नापने कार से निकल पड़े आराम से दो दिन भोपाल में बिता कर हम वापस लौट चले ।यह संस्मरण इतना ही आगे के भोपाल प्रवास और वापसी के समय के संस्मरण के बारे मे हम अगले संस्मरण मे लिखेंगे
इरा जौहरी
स्वरचित
लखनऊ से भोपाल यात्रा का संस्मरण
२५/९/२०१८
❆ तिथि – 25 सितम्बर 2018
❆ वार – मंगलवार
भाग -१
.
जब भी संस्मरण लिखने की बात आती है मन यादों के गलियारे मे दौड़ने लगता है ।आज कुछ समय पहले की गयी यात्रा के विचार अचानक स्मृतियों के सागर मे गोता लगाने लगे तो सोंचा चलो यही सही ।
तो यह संस्मरण हमारा भोपाल यात्रा का है जहाँ हमारे मामा की नातिन यानी हमारी दीदी की बेटी की शादी थी ।पहले तो हमारा जाने का कोई इरादा नही था पर फिर परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि हम भी साथ मे चल दिये ।हुआ यह कि पहले जाने वालों में सात लोग यानी एक गाड़ी पूरी भर कर भोपाल जा रही थी पर लखनऊ से निकलते ही ड्राइवर के पास उसके किसी अपने की मौत की खबर आ गयी और उसे घर में बुलाया जा रहा था तो उसने आगे जाने से मना कर दिया ऐसे मे सब वापस आ गये अब फिर बेटे ने नया इंतजाम किया अबकी बार जो गाड़ी तय हुई उसमें चार लोग ही जा पाते ।तो बेटे ने कहा चलो हम भी अपनी गाड़ी निकाल लेते है अब आनन फ़ानन मे हम भी अपने घर दौड़े और फटाफट शादी के हिसाब से तैयारी करके सबके संग लग लिये एक सीट खाली जो थी ।
हम सब रात में ही माँ के पास से खाना खा कर निकल पड़े थे ।बेटे के साथ इतनी लम्बी दूरी तय करने का यह हमारा पहला मौक़ा था और हमने इस यात्रा का पूरा लुफ़्त उठाया ।चलती गाड़ीमें बस यही लगता कि रास्ते में कहीँ बेटे को नींद ना आ जाये तो पूरे रास्ते उससे कुछ ना कुछ बोलते ही रहे ।सन्नाटी सड़क पर दौड़ती हुई गाड़ी पर बैठने का अलग ही मजा था और साथ मे भाई भाभी संग बतियाना एक अलग ही ख़ुशनुमा एहसास था कभी दीदी जीजा जी व मौसी संग बैठ कर उनसे बतियाने लगते पूरे रास्ते सफर को जग कर ही गुज़ारा ।रात मे सड़क किनारे पड़ने वाले ढाबे पर रुककर कुछ समय गाड़ी चलाने वालो ने अपने हाथ पैर सीधे किये और हम लोगों ने भी उतर कर रात का नैसर्गिक आनन्द उठाया ।हल्की थकान उतार कर फिर सब आगे की ओर चल दिये सुबह के समय हम लोग जिस ढाबे पर रुके उसके चारों तरफ बहुत ही खूबसूरत खेत खलिहान दिखे दूर खजूर के वृक्षों ने तो हमारा मन ही मोह लिया था ।
सुबह की चाय पी कर हम आगे की यात्रा की ओर बढ चले अब मध्यप्रदेश की छोटी छोटी पहाड़ियों की मनमोहक श्ंखला शुरू हो रही थी सबका आनन्द लेते हुये हम आगे बढ़े जा रहे थे रात भर जागने के बाबजूद नींद कहीँ दूर चली गयी थी ।आगे बढ़ने पर किसी नगर क्षेत्र मे घुसने पर गरमगरम जलेबी व पोहा बनता दिखाई दिया जिसको देखते ही हम समझ गये कि हम मध्यप्रदेश मे प्रवेश कर गये हैं ।सबका आनन्द लेते हुये हमने अपना सफर जारी रखा तभी आगे हम लोगो को सतपुड़ा की पहाड़ियाँ नजर आने लगी और साँची का स्तूप भी दिखने लगा तो शादी के घर मे जाने से पहले उसको देखने का लोभ छोड़ नहीं पाये ।समय बहुत हो रहा था शादी के घर से दीदी के फोन आ रहे थे कि कितनी देर है सबका इंतजार खाने पर हो रहा है सब जल्दी आओ फिर विवाह के कार्यक्रम भी शुरू होने थे ।तो हम सबने दौड़ते भागते सब दर्शन करते हुये खूबसूरत दृश्यों को कैमरे मे क़ैद करते हुये भोपाल शहर मे प्रवेश करते हुये विवाह स्थल पर पँहुचे जहाँ जलपान व भोजन के पश्चात विवाह के कार्यक्रम मे शामिल हो कर रात में फिर एक बार भोपाल की सड़के नापने कार से निकल पड़े आराम से दो दिन भोपाल में बिता कर हम वापस लौट चले ।यह संस्मरण इतना ही आगे के भोपाल प्रवास और वापसी के समय के संस्मरण के बारे मे हम अगले संस्मरण मे लिखेंगे
इरा जौहरी
स्वरचित
लखनऊ से भोपाल यात्रा का संस्मरण
२५/९/२०१८

