लघुकथा/कच्ची मिट्टी पर पक्के रंग
कच्ची मिट्टी पर पक्के रंग
“जैसे जैसे दीवाली निकट आती जा रही है सभी के हाथों में तेज़ी सी आने लगी है ।जब से शहरी लोगो के मन में यह विश्वास पैदा हुआ है कि कच्ची मिट्टी की मूरत की पूजा करनी चाहिये और मिट्टी के ही दिये जलाने चाहिये तब से हम ग़रीबों के घरों मे भी मिट्टी के चूल्हे की आग तेज होने लगी है हमे भी भरपेट खाना मिलनें लगा है “यह सब सोंचते हुये करमू की दुल्हनियाँ भिनसारे से ही दिया रंगने बैठ गयी ।
गीली गीली चिकनी मिट्टी चाहे जैसे जिस रूप मे ढाल लो ।बस चाक को कुशलता से चलाना आवै चाही फेर जैसन चाहे बर्तन ढाल लेवो ।कच्चे रंग पक्की मिट्टी पर चढनें लगे विचारों मे भी गति आने लगी मन पखेरु सा उड़ने लगा ।याद आने लगा बाबा ज़मींदार के यहाँ किसानी करते थे फिर भइया ने बढईगिरी का काम सीखा और फिर उसे यहाँ कुम्हारटोला मे ब्याह दिया गया ।
सब अपने अपने तरीके से एक तरह से कामगार श्रमिक ही हैं ।अगर एक दिन काम ना करें तो खाने के लाले पड़ जाये ।फिर यह सोंच कर वह मुस्कुराने लगी कि “और कुछ हो ना हो कम से कम हम शहर मे अपनो से दूर ग़ैरों की चाकरी तो नही कर रहे ।हम अपनी मर्जी से काम करते है ।चाकर तो है हम पर अपने घर के ।”और फिर कच्ची मिट्टी के पक्के बर्तनों पर तेज़ी से रंग चढ़ाने लगी ।
इरा जौहरी
लघुकथा कच्ची मिट्टी पक्केरंग
१८/१०/२०१८


