अनाथ
(४७)
लघु कथा
अनाथ
अनाथ शीर्षक से हमे अपने जीवन के प्रेरणा स्त्रोत के विषय मे लिखने का ख़्याल मन मे आया जिन्होंने विषम परिस्थिति मे भी उठ कर ऊँचा मुक़ाम पाया अभी शिव रात्रि पर उनका जन्मदिन था हलाँकि अब वो इस दुनिया मे नहीं है पर उनकी बातें सदा आगे बढ़ने को प्रेरित करती रहती हैं किशोरावस्था मे वो और उनके तीन भाई बहन माता पिता को खोकर अनाथ हो गये थे चाचा चाची ने उनका पालन पोषण किया उनके भी बच्चे थे परिवार बड़ा था एसे मे उन्होने किशोरावस्था मे ही नौकरी शुरू कर दी हलाँकि ननिहाल मे ज़मींदारी होने के कारण बहुत धन दौलत थी पर ख़ुद्दारी ने कभी किसी से माँगने ना दिया सोलह साल की उम्र मे उन्होने पेशकार की नौकरी शुरू कर दी और भोजनावकाश मे जब सब चाय समोसा खाकर गप्पे लड़ाने जाते थे वो बैठ कर गणित के कठिन सवाल हल करने मे लगे रहते थे वो ज़माना और थाअक्सर कम उम्र मे शादियाँ हो जाया करती थी सो चाचा चाची ने उनकी भी शादी कर दी थी अब परिवार और बड़ा हो गया था लेकिन उनको कोशिशें जारी थी और वो एक दिन अपनी मेहनत के बलबूते पर एकाउंट्स ऑफीसर बन गये एक वक्त एसा भी आया जब चमोली मे नौकरी के दौरान स्थानांतरण होने पर बद्रीनाथ के द्वार खुलते समय घोड़ों पर जाने वाले समूह मे वो भी शामिल हुआ करते थे यानी द्वार खुलने पर पुजारी जी के साथ प्रथम प्रवेश करने वालों मे से वो भी थे ।
उनसे कभी उनके बचपन के बारे मे पूँछने पर वो कहते थे अनाथ का भी कोई बचपन होता है निरन्तर संघर्ष होता है और अपने बच्चो को और उनके भी बच्चो को उन्होंने सदा एक अनुशासन मे रखा और यही सीख देते रहे कि ऊँचा मुक़ाम पाना है तो जिन्दगी मे कड़ी मेहनत करने से कभी पीछे मत हटो अपनी परेशानियों का रोना सबके सामने नही रोना चाहिये जीवन मे यदि कोई समस्या आये तो उसका डटकर मुक़ाबला करना चाहिये क्योंकि हर समस्या का समाधान जरूर होता है हमारे बच्चो ने बचपन से कड़े अनुशासन मे रहना उन्हीं से सीखा
ऑग्लभाषा पर उनकी गहरी पकड़ तो थी ही बहुत से लोग उनसे ज्ञानार्जन के लिये आते थे साथ ही उनको उर्दू , अरबी व फ़ारसी भाषा का भी ज्ञान था
आज वो हम सबके बीच नहीं है पर उनकी बातें और उनके दिखाये रास्ते पर चल कर उनके बच्चे और उनके भी बच्चे सभी अपने अपने जीवन मे अच्छे मुक़ाम पर हैं हमने भी उनसे जीवन मे बहुत कुछ सीखा और प्रेरणा भी ली वो और कोई नही हमारे बच्चो के प्यारे बाबा और हमारे पूज्य ससुरजी “श्री राजेन्द्रकुँअर जौहरी “जी थे उनको शेर औ शायरी का भी बहुत शौक था लिखते भी थे और जब हमारे पापा से उनका मिलना होता था या फोन पर भी दोनो मिल कर शेर ओ शायरी भी कहते थे और गुज़रे वक्त की बातें भी करते थे दोनो समधियों का इस तरह मिलना हम सबको बहुत खुशी देता था हलाँकि अब वो हमारे बीच नहीं है पर जब भी हम पर कोई परेशानी आती है वो सपने मे आते है और परेशानी दूर हो जाती है आज अनाथ शीर्षक के अन्तर्गत उनके बारे मे लिखते हुये मुझे और भी बहुत सी बातें याद आ रही है एक बार मै मैदे से मोगरे की कलियाँ बना रही थी तो वो बोले माँ की याद आ गयी वो बचपन मे बनाया करतीं थी अन्त समय जब वो अशक्त हो गये थे एक कटोरी दाल भी नही खाना चाहते थे वह खाने के लिये कहते थे आप तो माता की तरह पीछे पड़ कर खिला रहीं है जीँ हाँ उनकी एक ख़ूबी यह भी थी कि वो हम बहुओ को भी आप कर कर सम्बोधित करते थे एसे थे हमारे अनाथ पूज्य ससुर जी 🙏🙏
इरा जौहरी
लखनऊ
अनाथ शीर्षक के अन्तर्गत हमने अपने पूज्य ससुर जी के बारे मे बताया पर जब हमने अपने पिछले जीवन मे झाँका तो पाया कि हमारे तो पूज्य नाना व बाबा दोनो ही बचपन मे अनाथ हो गये थे इसके बाबजूद दोनों ने अपने प्रयासों से ऊँचा मुक़ाम पाया बाबा श्री रामेश्वर दयाल सक्सेना जी आगे चल कर लन्दन से एम ए टी डिप करके कन्नौज के एस एन इन्टर कॉलेज के प्रिन्सिपल बने और नाना यानी बाबू गिरधर गोपाल जी कानपुर के पास बिल्हौर के नामी वक़ील हमारे सबसे छोटे मामा श्री आदर्श सुधा सक्सेना जी भी समूह से जुड़े हुये है वो हमसे ज्यादा उनके बारे मे बता सकते है
#१(४७)लघुकथा अनाथ
१७/२/२०१८

