अन्तर्वेदना
अन्तर्वेदना
स्तब्ध हूँ कुछ समझ नहीं पा रही ।
क्या कहूँ एसे कायरों को वो तो मौत का पैगाम दे कर कायराना हरकत को अंजाम दे कर चले गये पर हम सबके लिये एक सबक़ छोड़ गये हम छोटी छोटी बातों मे आपस में ही उलझ जाते है ।जरा जरा सी बात पर तैश में आ जातें हैं ।पर जब कुछ करने का समय आता है तो करते क्या हैं ।
हम तो कहतें हैं जो धरना प्रदर्शन करके जान देना चाहतें है उन्हे सेना में भेज देना चाहिये देखें तो आख़िर कितना बड़ा उनका कलेजा है ।
सामान्य लोग तो हर जगह अच्छे ही होते हैं ।पर ये जो मुट्ठी भर लोग हैं सबकी नाक में दम किये रहते हैं सामान्य जन तो शान्ति से ही अमन चैन से जीना चाहते हैं पर कुछ विकृत मानसिकता के लोग चिताओं की राख पर भी अपनी रोटियाँ सेंकने से बाज़ नही आते ।
आत्मा आर्तनाद करती है किससे और कैसे अपना दुख व्यक्त करें ।समझ नही आता ।
इतना तो पता चल ही रहा है कि इस तरह के कायराना हिंसक अंजाम देने वालो के सीने मे दिल ही नही होता ।इन हादसों मे मरने वाला शायद कोई उनका अपना नहीं होता वरना ऐसी वारदातों को कभी अंजाम नही दिया जाता ।हिंसा से मिलता आखिर क्या है समझ नहीं आता ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इंसाई
आपस में हैं सब भाई भाई
करो संकल्प और रखो सौहार्द
होली हम आपसी भाई चारे के साथ
हर हाल में मिलजुल कर मनायेंगे
जिन घरों के गये हैं लाल
उनके भी घर दीपावली के दीप जलायेंगे
बुझने ना देंगे अब उनके घरो के चिराग़ों को
नौनिहालो को उनके अब मिल जुल कर पढ़ायेंगे
छोड़ कर निज स्वार्थ देश हित के लिये करो काम
धरना प्रदर्शन को भी मत दो नित अंजाम
नष्ट करके अपनें ही देश की सम्पदा
सुख चैन कहाँ से पाओगे
वीर जवान करतें है रक्षा देश की
उनको मिटा तुम भी ना जी पाओगे
जय हिन्द
इरा जौहरी
लखनऊ
मौलिक
लेख / अन्तर्वेदना
१६/२/२०१९
