एक कहानी माँ की ज़ुबानी ( दो लघु कथायें )
एक कहानी माँ की ज़ुबानी
दृश्य एक
पहली लघुकथा
मोबाइल
टीवी पर सीरियल चल रहा है नायिका के हाथ मे गुलाबी मख़मली बटुये के साथ चौकोर मोबाइल हाथ मे है उसके बटन ऐसे चमक रहे है मानो हीरे जड़े हो देख कर रहा नही गया नीला के मुँह से निकल गया कि कितना सुन्दर मोबाइल है । बात आई गयी हो गयी । कुछ दिन बीते कि उसके बेटे ने उसके हाथ मे एक पैकेट पकड़ाया कहा यह तुम्हारे लिये है खोल कर देखा तो वह चौंक गयी अरे यह तो वही मोबाइल है दिल की खुशी को दबा कर उसने बेटे को डाँट लगायी कि क्या मै किसी चीज की तारीफ़ भी नही कर सकती । क्या जरूरत थी इतना मँहगा मोबाइल लाने की ।और पैसे कहाँ से आये प्रश्नों की झड़ी लगा दी ।बेटे ने मुस्कुराते हुये कहा अम्माँ जितना मर्जी हो बाद मे डाँट लेना बस इतना बता दो तुम्हें पसन्द है ना और चिन्ता मत करो यह मै अपने जोड़े हुये पैसों मे पापा से लिये हुये पैसे मिला कर लाया हूँ । चोरी नहीं की है । आज सालों बाद भी उस बात की यादे स्मृति पटल से जाती नही है । सोचो तो होंठों पर मधुर मुस्कान छा जाती है ।
इरा जौहरी
दृश्य दो
दूसरी लघु कथा
जन्मदिन
आज नीला का जन्मदिन है पति पत्नी दोनो चुपचाप बैठे हैं ।घर मे तनाव बिखरा हुआ है ।बात कोई विशेष नही पर तनाव है । हुआ यह कि मना करने पर भी युवा होता बेटा जो अट्ठारह साल का हो गया है और जिसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी है कार ले कर निकल गया है बात वही सबके साथ सबको ले कर जाये तो कोई बात नही अकेले कैसे मना करने पर भी चला गया अब पति महोदय का ग़ुस्सा तो पत्नी पर निकलना ही है । और जब एक ग़ुस्सा होगा तो दूसरा भी उदास ही होगा तो इस कारण से नीला कुछ उदास ही बैठी थी समय गुजर रहा था कि तभी दरवाज़ा खुला बेटा वापस आ गया था और कोई कुछ कहता इससे पहले ही जोर से बोला जन्मदिन मुबारक हो अम्माँ देखो मै तुम्हारे लिये क्या लाया हूँ और उसने अपने हाथो से साड़ी खोल कर अपनी प्यारी अम्माँ के ऊपर डाल दी । उदास मन यह देख कर बहुत खुश हो गया ।तभी नीला की निगाह साड़ी के टैग पर पड़ी “अरे यह क्या यह तो चार हज़ार की है इतने पैसे कहाँ से लाये मुझे नही चाहिये इतनी मंहगी साड़ी । “बेटा मुस्कराते हुये बोला “अम्माँ मै यह अपनी बचत के पैसों से लाया हूँ ये जो मुझे रोज पैसे देती हो मै इनसे लंच के समय कैन्टीन के समोसे नही खाता था तुम सबके लिये सोचती हो पर अपने लिये कुछ नही लेती इसलिये वही पैसे बचा कर जोड़ कर तुम्हारे लिये यह लाया हूँ । “यह सुन कर नीला की आँख मे आँसू आ गये ।घर मे लम्बे समय से मुफ़लिसी का दौर चल रहा था एसे में इतनी मँहगी साड़ी देख कर उसे मुंशी प्रेमचन्द की कहानी “ईदगाह “के हामिद का चिमटा याद आ गया।
इरा जौहरी
लघुकथा (एक कहानी माँ की ज़ुबानी )
१ मोबाइल २ जन्मदिन
१७/५/२०१८


