गजल/ऐ हुज़ूर
गजल
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#काफ़िया_मिलाओ –
दिनांक – 22 अगस्त 2018
.इक बार ही जी भर के दे दो सज़ा ऐ हुज़ूर ,
मुश्किल में जिये जाती हूँ तेरे बिना ऐ हुजूर ।
जुस्तजू थी तेरी वफा की जो ना पाई हमनें ,
तमन्ना नहीं अब तेरी चाहत के सिवा ऐ हुज़ूर ।
प्यार तुमको भी था जो शिद्दत से किया हमीं से ,
बदक़िस्मती थी कि पा के तुम्हे खो दिया ऐ हुज़ूर ।
जिन्दगी नें क्या हंसीं गम दिया हैं रोने के लिये ,
गुज़रा वक्त क्यों ना ठहरा दिल दरिया ऐ हुज़ूर ।
आओ चलो बैठें कुछ देर पीपल की घनी छाँव ,
वो बचपन का गाँव और बहती नदिया ऐ हुज़ूर ।
गुफ़्तगू में तुम अपनी कहना और कुछ सुनना मेरी ,
वो गम के आँसू चलो मिल के आये बहा ऐ हुज़ूर ।
आई फिर से आज ईद छाई है मस्ती सभी के दिलों मे ,
आ मिलो गले ‘इरा” कि कभी जुदा ना होना ऐ हुज़ूर ।
इरा जौहरी
स्वरचित
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★ #अहमद_फराज़ जी द्वारा लिखित पूरी ग़ज़ल ★
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इक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते।
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते।
जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते,
ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते।
मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते।
अब शिद्दते ग़म से मेरा दम घुटने लगा है,
तुम रेशमी ज़ुल्फों की हवा क्यों नहीं देते।
रह रह के न तड़पाओ ऐ बेदर्द मसीहा,
हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यों नहीं देते।
जब मेरी वफाओं पे यकीं तुमको नहीं है,
तो मुझको निगाहों से गिरा क्यों नहीं देते।
साया हूँ तो साथ ना रखने का सबब क्या ‘फ़राज़’,
पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते।
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गजल
२२/८/२०१८



