गुरुमन्त्र
लघुकथा
गुरुमन्त्र
इधर उधर की बाते करते करते वो अपनी बहू के बारे में बात करने लगी और बोली “ क्या बताये जब से बहू घर में आई है मन का खाना खाने को तरस गये “।
माँ बोली “क्यो तरस गयी हाथ पैर तो सलामत है बना कर खाया करो ।करती क्या हो दिन भर ?” वो बोली “ अब बहू जब से आई है वही खाना बनाती है हम उसके बच्चे को संभालते है ।”
माँ बोली “ऐसा है अब से खाना आप भी पकाया करो इससे आप अपने मन का पका सकोगी । बहू को बच्चे के काम करने दिया करो इससे वह भी खुश रहेगी और फिर जो उसका मन हो उसे भी बनाने दो ।दोनो मिल कर दोनो काम करोगी तो दोनो मे तालमेल भी अच्छा बैठेगा और दोनो के मन का भोजन भी रहेगा इससे दोनो ही खुश रहोगी ।”
बात उनकी समझ मे आ गयी । कुछ समय बाद उनकी बहू जब मिली तो वह चहक रही थी बोली “पता नही चाचीजी ने कौन सा गुरूमन्त्र सासूमाँ को दिया है कि वो तो एकदम ही बदल गयी हैं ।”
इरा जौहरी
स्वरचित
गुरुमन्त्र
१६/७/२०१८

