घर वापसी
लघुकथा
घर वापसी
नन्हा सौमित्र और सुगन्धा अब बड़े हो रहे थे ।दादी बाबा के बिना घर मे छाये सूनेपन में उन्हें अच्छा नही लगता था ।तो सहज उत्पन्न बाल स्वभाव उत्सुकता वश पूँछ लिया।”माँ दादी बाबा को गये बहुत दिन हो गये अभी तक आये नहीं ।”माँ ने भी सहजता से जबाब देकर संतुष्ट कर दिया कि “यहाँ उनका मन नही लगता था तो वो अपने दोस्त के साथ रहने के लिये पहाड़ों पर चले गये हैं।”दिन गुजरते गये ।अब सब बस एक तरफ बाबा दादी की दीवार पर टँगी फोटो देख कर संतोष कर लेते थे ।
बच्चे बड़े हो रहे थे तो अच्छी पढाई के लिये अब उनकी कोचिंग भी लगा दी गयी थी ।शाम का समय बच्चो के कोचिंग जाने का होता था ।इधर कुछ दिनों से बच्चे देर से घर वापस आ रहे थे ।पूँछने पर उत्तर मिला कि कोचिंग वाले सर पढाई ज्यादा करा रहे हैं।एक दिन देर कुछ ज्यादा हो गयी तो माँ को चिन्ता हुई कि तो कोचिंग मे फोन लगा दिया ।वहाँ बात करने पर पता चला कि आजकल तो वो जल्दी ही भाग जातें है उनके बाबा दादी की तबियत शायद खराब है इसलिये तो हम भी कुछ नहीं कहते ।
यह सुनना था कि बच्चों के माता पिता एक दूसरे का चेहरा देखने लगे और वहाँ से सीधे उस वृद्धाश्रम की ओर भागे जहाँ वे बच्चो के बाबा दादी को छोड़ आये थे और पलट कर कभी सुध ही ना ली थी ।वहाँ जा कर जो उन्होने देखा तो शर्म के मारे अपने ही बच्चों से आज वो आँखें नहीं मिला पा रहे थे ।वहाँ उन्होने देखा कि बच्चे अपने बाबा दादी के साथ ही बहुत से बुजुर्गों की सेवा में तत्परता लगे हुये थे बच्चो के साथ उनके हमउम्र साथी भी उनका साथ दे रहे थे ।आये तो वे बच्चो को डाँटने थे पर उनसे आज वो शिक्षा ले कर माता पिता के साथ घर वापस जा रहे थे
इरा जौहरी
स्वरचित
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२२/८/२०१८

