चप्पल
लघुकथा
चप्पल
चप्पल पर पूरा शरीर टिका होता है वह हमेशा सही होनी चाहिये इस विचारधारा पर अमल करते हुये जब पुरानी हो कर घिसने पर कई बार फिसलते फिसलते बची तो बेटे से मनुहार की कि बेटा चलो चप्पल दिला दो ।पर व्यस्तता के चलते वह चप्पल दिलाना भूल जाता था ।एक दिन जब अति हो गयी तो बेटे से कहा कि “अब मै नंगे पैर चलूँगी मुझे यह पुरानी चप्पल नही पहननी और हाँ मुझे सस्ती वाली स्लीपर ही चाहिये ।”तभी माँ यानी बेटे की नानी भी बोल पड़ी “चप्पल तो मुझे भी चाहिये ।”
शाम के समय बेटे ने घर मे घुसते ही बड़ी खूबसूरत सी चप्पल पैरों मे पहना दी ।देखते ही बोल पड़ी “बहुत खूबसूरत है जरूर मंहगी होगी मैने पहले ही कहा था सस्ती लाना इतनी मंहगी मुझे नही चाहिये थी ।”तभी बेटे ने एक और जोड़ी सुन्दर सी चप्पल निकाल कर नानी को पहना दी ।नानी खुश हो कर बोली “हमारा मन तो था ऐसी ही पहनने का पर यहाँ पास मे हमे हमें मिली ही नही ।”
फिर जब अकेले मे बेटे से दाम पूँछें तो “अम्मा अच्छी चीज मंहगी ही मिलती है पसन्द तो हमें ढाई हज़ार वाली ही आ रही थी पर सोंचा यदि यह ले ली तो घर मे भी चप्पल ही मिलेगी इसी से ये ढाई सौ वाली ले आया कि ज्यादा नही पड़ेगी ।”यह कह कर मुस्कुराने लगा ।
स्वरचित
इरा जौहरी
लघुकथा /चप्पल
६/९/२०१८

