जानें कहाँ गये वो दिन !! पहला भाग
जाने कहाँ गये वो दिन
पहली रचना
पहला भाग
याद आता है वो बचपन जब ना कोई फ़िक्र ना कोई चिन्ता सुबह होती थी गर्मी की छुट्टियों मे स्कूल तो बन्द होते थे पर कोई सारे जामुन ना बीन कर ले जाये इसलिये जल्दी उठ कर भइया संग घर के पिछवाड़े दौड़ जाते थे और फिर ढेर सारी जामुनें जब सफेद फ्राक के घेर में भर कर लाते थे बुआ चाचा सब स्वाद ले कर खा जाते थे और फिर फ्राक पर पड़े दाग़ों की वजह से माँ की डाँट हमे खानी पड़ती थी पर उसमें भी एक मजा थाऔर जब घर मे चुसवाँ आम आते थे पलंग के नीचे रख दिये जाते थे ऊपर दादी सोती थीं कि कोई आम ना ले जाये और हम अपने भाइयों संग वहीं नीचे घुस कर आराम से आम चूस कर मजे से निकल आते थे याद करूँ तो एक नहीं अनेक क़िस्सों से बचपन भरा पड़ा है याद आता है बचपन मे हमारा वृहद संयुक्त परिवार हुआ करता था हमारे पापा नौं भाई बहन थे पापा तीसरे नम्बर के थे और हम भी तीसरे नम्बर के थे भाई बहनो की सेना बनी हुई थी हमारी ताई के दो बेटे हैं एक बड़े दादा और दूसरे छोटे दादा हमने कभी नही जाना कि वो हमारे चचेड़े भाई है यह तो बड़े होने पर महसूस हुआ ख़ैर हम और हमारा छोटा दादा एक सेना के सेनानी हुआ करते थे जबकि बड़े दादा और छोटा भाई आशीष दूसरी सेना के सेनानी हुआ करते थे छोटे दादा हमारा बहुत ख़्याल रखता था तब हम बहुत मोटे थे तेज़ दौड़ भी नहीं पाते थे और हमारे छोटे दादा सबसे हमारे लिये भिड़ जाया करते थे हमारे साथियों मे अगर कोई हमे मारता था तो वह उसे पीट आता था और मुझसे कहता था भागो और वह तो भाग जाता था जबकि जिसे वह पीटता था वह वापस आ कर मुझे फिर से पीट देता था हमारा घर रेलवे लाइन के किनारे रेलवे के क्वाटर्स मे हुआ करता था हमारे पापा रेलवे मे गार्ड थे तो रेलवे की पटरियों के किनारे और ऊपर हम खूब भागा दौड़ी करते थे लाइन के किनारे के घरों मे कनेर के पेड़ भी हुआ करते थे उन पीले फूलों को ऊँगलियों मे पहन कर खूब खेलते थे अब तो बस वो मीठी यादे ही जीवन मे रह गयीं है सोचती हूँ कि हम अपने बच्चो को वह अल्हड़ बचबन नही जीने दे पाये बचपन से ही उन पर पढाई का बोझ डाल दिया हमने तो बचपन मे बालू मे खेलते हुये खूब रेत के घरौंदे भी बनाये है तो दीपावली पर मिट्टी के घरौंदे भी जब हम अपने बच्चो को यह सब नही दे पाये तो आने वाले समय में हमारे बच्चे अपने बच्चो को क्या दे पायेंगे आज तो हम देखते हैं नन्हे नन्हे बच्चे सुबह स्कूल जाते हैं तो शाम के समय ट्यूशन के लिये जा रहे है अभी ठीक से बोलना आया नही और कोचिंग मे पढ़ने जा रहे है कि बढिया स्कूल में एडमिशन लेना है सारे नियम कायदे पहले से ही आ जाये
बचपन की यादों के किस्से तो इतने सारे हैं कि जितना भी लिखूँ तो लगे कि अरे वो क़िस्सा तो छूट गया हाँ बचपन की बातें करते समय यदि नानी के घर की बातें ना कहीँ तो बात ही पूरी नही होगी हमारी नानी का घर कानपुर के पास बिल्हौर नाम के क़स्बे मे आज भी है हम लोग गर्मी की छुट्टियों मे तो वहाँ इकट्ठे होते थे खूब ऊधम करते थे वहाँ घर की छत पर लकड़ी की धन्नी लगी होती थी और उस पर मिट्टी यानी छत भी कच्ची मिट्टी होती थी हम सब गर्मी के मौसम मे छत पर सोया करते थे हमारी माँ आठ भाई बहन थे तो इस हिसाब से ननिहाल मे भी हमारा बड़ा परिवार था हम सब भाई बहन मिल कर खूब शैतानी किया करते थे नानी के घर मे एक गाय घर हुआ करता था जहाँ करौदे फ़ालसा व मेहंदी के पेड़ हुआ करते थे जब भी ढूँढा जाये हम बच्चे वहीं मिलते थे
नानी के घर की बात करूँ तो जब तक नाना का ज़िक्र ना करूँ वर्णन अधूरा ही रह जायेगा हमारे नाना एक जाने माने वक़ील थे बाबू गिरधर गोपाल बहुत नाम था उनका नातिन तो वैसे भी नाना नानी की लाड़ली होती ही हैं हमारे नाना हम सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे बचपन मेहमारा करीब साल भर नाना के पास रहना हुआ था नाना अपने साथ जब अपने मित्र की दुकान पर ले जाते थे वो हमारी फ्राक की जेबें मेवों से भर देते थे उस ज़माने मे दुकानों मे बड़े बड़े थाल भर कर मेवे बिक्री के लिये दुकानों मे रखे जाते थे हाँ तो आगे बताये जब गाँव मे हाट (यानी गाँव मे लगने वाला साप्ताहिक बाजार )लगती थी नाना हम सभी दस पन्द्ह बच्चो को लेकर हाट जाते थे और किसी पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ जाते थे और हम सबसे कहते थे जिसका जो मन हो ले लो हम सब बच्चे बिखर जाते थे और अपने मन की चीजे ले लेते थे फिर नाना उठते थे और जिससे जो सामान लिया हो उसको उसका मूल्य चुका देते थे वह वो ज़माना था जब हम बच्चे छोटी छोटी चीज़ों मे ही खुश हो जाया करते थे आज जब हम अपने बच्चो को यह बात बताते है तो वो कहते है आज के युग मे वो नाना जी होते तो वैसा नही कर सकते थे आज के बच्चो की चाहतो को पूरा करना किसी के बस मे नहीं है सन् इकत्हतर मे हमारे नाना नही रहे उसके बाद तो सब कहानी हो गयी नाना के साथ ही मै अपने नवागन्तुक भाई को देखने के लिये बकसिया भर कर खिलौने ले कर आई थी आज भी याद है रात का समय था कमरे मे अँधेरा था मोमबत्ती की रोशनी टिमटिमा रही थी जब मै माँ के पास पँहुची माँ ने कहा देखो तुम्हारा भइया आज भी वह पल हमारी आँखों के सामने यादों मे रहता है आज वह भाई हमसे दूर सात समन्दर पार है दो साल हो गये हमे मिले हुये जीवन मे इतने सालों मे बहुत कुछ बदल गया है बचपन मे मै दो भाइयों के बाद आई थी दोनो की लाड़ली बहन थी सावन मे जब हाथों मे मेहंदी लगती थी दोनो भाई अपने हाथो से खाना खिलाते थे घर मे हमारे लिये झूला डाला जाता था भाई लोग झूला भी झुलाते थे अब तो झूला झूले बरसों बीत गये बचपन भी चला गया जहाँ छोटी बच्चियाँ दिखतीं है वहाँ भी सावन के महीने में भी झूले नज़र नही आते झूले से याद आया हमारी ननिहाल मे बरामदे मे एक बड़ा सा झूला हमेशा पड़ा रहता था वैसे तो उसपर लकड़ी का पटरा रखा जाता था पर कभी कभी जब मन होता था छोटा खटोला उन रस्सियों मे फँसा कर हम लोग झूला झूला करते थे नानी के घर मे चौपड़ भी था और रात के समय नानी खूब सारी पहेलियाँ पूँछा करती उस समय हमको सौ से ज्यादा पहेलियाँ मुँह जबानी याद हो गयीं थी हमारी माँ को पृथ्वीराज रासो पूरी कंठस्थ थी घर के सभी सदस्य मिल कर अंताक्षरी खेला करते थे वह आदत आज भी हममें विद्यमान है पहले ज़माने मे टेलीवीजन मीडिया का लोगो की जिन्दगी मे दखल नहीं था माता पिता बुज़ुर्ग लोग बच्चो को अपनी विरासत के बारे मे बताया करते थे जैसे हमारे बाबा पढाई करने लंदन गये थे तो वो वहाँ जिस घर मे ठहरे थे सालों बाद जब हमारे चाचा लंदन गये और उस घर मे गये वहाँ आज भी बाबा का नाम लिखा हुआ है ये बातें लिखने मे जितना मुझे मजा आ रहा है पाठक गण को भी यह सब पढ़ने मे शायद इतना ही आनन्द आये बातें बहुत हैं क़िस्से भी बहुत है बाकी दूसरी रचना मे
इरा जौहरी

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