पथिक
“राहगीर “शीर्षक पर आधारित लघुकथा
“पथिक ”
अब मैं कुछ बन कर ही दिखाऊँगी एसा कह कर जिन्दगी में देखे ऊँचे सपनों को पूरा करनें की चाहत में मैं एक बैग में अपने जरूरी काग़ज़ ले कर शहर की ओर निकल पड़ी ।जिस कॉलेज में दाख़िला मिला था वहाँ शिक्षा का सत्र पूरा करनें तक ही हास्टल में रहने की आज्ञा मिली थी ।नौकरी मिलनें पर हॉस्टल खाली कर देना था ।कमरे में दो तख़्त पड़े थे एक मेरा था दूसरे में पता नहीं कौन आने वाला था ।रहना तो वहीं था और कोई चारा ना था ।
शुरु में अकेले रहने की बात सोंच कर डर लगनें के साथ ही घबराहट भी हो रही थी ।घर की ख़ासतौर पर माँ की बहुत याद आ रही थी ।वार्डन से बात की कि कोई दूसरा कमरा दे दें जहाँ कोई साथी तो हो पर उनके इस आश्वासन पर कि जल्द ही साथ वाले तख़्त पर नयी लड़की आ जायेगी चुपचाप मैं वापस आ गयी ।
रात के समय रोशनदान से दिखते वो खजूर के पेड़ के हिलते हुये पत्ते अजीब सा डर पैदा कर रहे थे तभी पास वाले कमरे की लड़की शायद वह भी अकेली थी अपना बिस्तर समेट कर हमारे ही कमरे में आ गयी ।हमनें भी सोंचा जिन्दगी के सफर में यह भी सही चलो एक से भले दो ।अब अकेले डर से जग कर रोते हुये रात तो नहीं काटनी पड़ेगी ।
अभी नींद आई ही थी कि पास के कमरे से आते शोर से आँख खुल गयी ।पता चला कि वहाँ रहने वाली किसी सीनियर लड़की को नयी नौकरी मिल गयी थी ।वह अपने नये सफर की खुशी में सबके साथ मिल कर पार्टी कर रही थी ।उसको खुश देख कर मैं भी निश्चिन्त हो कर भविष्य के सुनहरे सफर की #पथिक बन सपनों में खो गयी ।
इरा जौहरी
मौलिक � १२/७/२०१९

