प्रतापगढ यात्रा संस्मरण
❆ संस्मरण –
❆ तिथि – 31 जुलाई 2018
❆ वार – मंगलवार
जन्मभूमि प्रतापगढ़ (अवध) की अविस्मरणीय यात्रा का वर्णन
.
जीवन मे बहुत सी यादें एसी होतीं है जिनको इंसान कभी नहीं भूलता ।वह चाहें अच्छी हों या बुरी ।उन्हीं यादों मे व्यक्ति अपना बचपन कभी नहीं भूलता ।जहाँ हमारा जन्म हुआ था और हमारा बचपन गुज़रा था उस शहर मे हम करीब नौ वर्ष रहे फिर पापा के स्थानान्तरण की वजह से दूसरे शहर बनारस जाना पड़ा ।
वहाँ से फैजाबाद होते हुये हम लोग फिर लखनऊ मे आ कर स्थाई रूप से बस गये ।यहाँ रहते हुये भी हमे पैंतिस साल के करीब हो गये है ।इधर कुछ वर्षों से मुझे अपना जन्मस्थान यानी बचपन का वह घर जहाँ जीवन की खट्टी मीठी यादे बसीं हुईं है सपनें में दिखाई पड़ता था। मैने यह बात उसी शहर मे रहने वाली अपनी सहेली को बताई तो वह बोली कि एक बार घूम जाओ तो ऐसे सपने आने बन्द हो जायेंगे उसके बहुत बार बुलाने और हमारी एक और अभिन्न सखि के बम्बई से आने के बाद हम सबने वहाँ जाने का इरादा किया ।नियत समय पर हम सभी को लेकर हमारा बेटा हमारी जन्मस्थली की ओर ले कर चला ।करीब चार घंटे का सफर तय करके हम अपने जन्मस्थान प्रतापगढ (अवध)पँहुच गये ।
प्रतापगढ पँहुचने से पूर्व ही हम लोगों ने अपने पँहुचने की सूचना दे दी ।इस कारण मुख्य मार्ग पर ही हमारी सहेली हम लोगो का अपने श्रीमान जी के साथ इंतज़ार करती हुई मिली ।उससे मिल कर हम लोगो को जो खुशी मिली उसको हम शब्दों मे बयान नही कर सकते ।घर पँहुचते पँहुचते रात हो गयी थी तो हम सबने खाना खा कर देर रात तक जगते हुये खूब सारी बाते की ऐसा लगा कि कॉलेज का समय वापस आ गया हो ।
हम लोग लम्बे समय बाद मिले थे तो बातें खत्म होने का नाम ही नही ले रहीँ थी अगले दिन बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर हम लोग मन्दिर दर्शन को गये और जब तक अपने रेलवे स्टेशन के पास स्थित घर तक पँहुचे रात हो गयी थी ।घर का रास्ता ही दिमाग से उतर गया था कभी लगता यही है तो कभी भूल जाते ।फिर थोड़ा बहुत भटकने के बाद तय किया कि अगले दिन वापसी से पहले दिन मे आयेंगे ।
फिर अगले दिन सुबह की रोशनी मे रास्ता पूँछते हुये घर ढूंढ ही लिया ।पर इतने वर्षों मे बहुत कुछ बदल चुका था ।जिस रेलवे के क्वाटर्स मे हम लोग रहा करते थे ।घरों मे रहने वाले लोगों की वजह से कालोनी मे रौनक़ हुआ करती थी ।वहाँ सब वीरान सा पड़ा हुआ था वहीँ पर लकड़ी के खोखे मे दुकान खोले महिला ने बताया कि अब तो बहुत से घर खाली पड़े हैं घरों के जीर्ण शीर्ण अवस्था मे होने के कारण लोग इनमें नही रहते । सच बतायें हमें उन घरो की हालत देख कर बहुत खराब लगा जहाँ कभी हम खेला करते थे खूब खेती होती थी वहाँ झाड़ झंगाड़ उगे हुये थे दीवारों की ईंटें झड़ रही थी।
ख़ैर हमें वहाँ पँहुच कर अलग ही खुशी प्राप्त हुई ।जहाँ हमारा जन्म हुआ था वह अस्पताल भी देखने हम गये थे और वहाँ का खास उत्पाद ऑवले की बर्फी जो हमारी सहेली ने हम लोगो के लिये ली थी वह लेकर बहुत सारी ख़ुशनुमा यादों के साथ हम लोग दोपहर मे वापस चल कर रात तक लखनऊ वापस आ गये। जन्मभूमि की यह यात्रा हमारे लिये एक अविस्मरणीय यात्रा थी।
इरा जौहरी
लखनऊ
स्वरचित
प्रतापगढ यात्रा संस्मरण
३०/७/२०१८

