३))बचपन की मोहब्बत को फिर से पानें का इरादा रखतें हैं
गजल
क़ाफ़िया मिलाओ आयोजन
पहला मतला मिसरे से
“दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला ”
क़ाफ़िया -आने
रदीफ-का इरादा रखते हैं
तिथि-२०/६/२०१८
वार -बुद्धवार
बचपन की मुहब्बत को फिर से पानें का इरादा रखते हैं ,
दिल में दोस्तों संग दोस्ती निभाने का इरादा रखतें है ।
वो बचपन के हसीन लम्हे और खुशनगवार किस्से ,
चाहत में तेरी ए दोस्त दिल जलाने का इरादा रखतें है ।
वो दिन रात का हँसीं तराना तेरे संग गाना और गुनगुनाना ,
एक बार फिर से तेरे संग वक्त बितानें का इरादा रखतें हैं ।
बरसाती मौसम में वो भागमभाग करते हुये कॉलेज कैन्टीन जाना ,
और दोस्तों के संग में फिर से वो समोसे खाने का इरादा रखते हैं ।
चाहते तो बहुत सी हैं “इरा” तेरी आख़िर हसरतें पूरी तरह टूटी नहीं ,
हसीन पलों का वह बीता वक्त फिर से लौटाने का इरादा रखतें हैं।
इरा जौहरी
★ #अहमद_फराज़ जी द्वारा लिखित पूरी ग़ज़ल ★
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दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला।
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला।
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अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मे’रा,
सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला।
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सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत,
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला।
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क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से,
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला।
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तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया,
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला।
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मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं,
कौन आयेगा यहाँ कौन है आने वाला।
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क्या ख़बर थी जो मे’री जाँ में घुला है इतना,
है वही मुझ को सर-ए-दार भी लाने वाला।
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मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते,
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला।
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तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’,
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।
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गजल
बचपन की मोहब्बत
२०/६/२०१८


