बहादुर बेटा !
लघुकथा
बहादुर बेटा
पति पत्नी दोनों लखनऊ में अकेले बैठे शाम की चाय पी रहे थे तभी फोन की घन्टी घनघना उठी ।फोन उठाया तो उधर से दिल्ली मे रह रहे बेटे की मरी मरी सी आवाज आई “अम्मा मैं अब जा रहा हूँ मैं बचूँगा नहीं । “चाय का प्याला पकड़े हाथ काँप उठे प्याला छूट कर मेंज पर आ गिरा ।”बेटा !बेटा! तुम कहाँ हो !ऐसा नहीं कहते !क्या हुआ है !”अम्मा हमारा एक्सीडेन्ट हो गया है मै दिल्ली हाइवे पर गिरा हुआ पड़ा हूँ बहुत चोट आई है ।हमारी पैन्ट फट गयी है” “कोई बात नहीं बेटा दूसरी पैन्ट बन जायेगी ।अम्मा नया कोट भी फट गया ।मत परेशान हो बेटा तुम तो सुरक्षित हो ना ।तुमने हैलमेट तो पहना था “”हाँ अम्मा पर वह भी टूट गया है “पर बेटा तुम्हारा सर तो सुरक्षित है “” हाँ अम्मा “अम्मा हमारा लैपटॉप वाला बैग भी उछल कर कहीँ गिर गया है और बहुत सी गाड़ियाँ आ जा रहीँ हैं ।” तू तो हमारा बहादुर बेटा है ना तो हिम्मत कर के उठो और अपनी बाइक उठाओ आस पास देखो जो सामान मिल जाये उठा लो और हिम्मत करके अपने कमरे तक पँहुचों “माँ की बातों से खुद के अन्दर हिम्मत भरता हुआ बेटा उठा सामान समेटा और किसी तरह बाकी दूरी तय करता हुआ अपने कमरे में पँहुचा ।जितनी देर में वह वहाँ पँहुचा माँ ने वहीँ दिल्ली में रहने वाले अपने चाचा को ख़बर कर दी अब तक करीब रात के ग्यारह बज गये थे माँ की सलाहानुसार उसनें पास मे रहने वाले अपने साथी से मँगा कर गरम दूध पिया जिससे दर्द में राहत मिली तब तक माँ के चाचा यानी उसके नाना अपनी कार से उसे लिवाने आ गये ।बेटे की हथेली ऊँगली और अँगूठे के बीच फट गयी थी बिना सुन्न कराये बिना आँसू गिराये उसने वहाँ टाँके लगवाये ।उस एक पल यदि वह गिरने पर हिम्मत हार जाता तो सम्भव था कि किसी बड़ी मुश्किल का तब सामना करना पड़ सकता था आज सब ठीक होने पर अकेले बैठे बैठे सुमी सब सोंच रही थी वह नन्हा अब बड़ा हो गया था ।
इरा जौहरी
स्वरचित

