बिखरी पंखुड़ियाँ
लघुकथा
बिखरी पंखुड़ियाँ
रिटायर होने के बाद बेटे बहुओं के साथ रहते हुये भी राजेन्द्र बाबू और उनकी पत्नी ने ख़ुद को कॉफी व्यस्त कर रखा था जिससे बुढ़ापे मे होने वाली परेशानियों से जितना हो सके दूर रहा जा सके पर एक ना एक दिन बुढ़ापा अपना असर दिखाता ही है ।जब से उनका घर में बंध कर रहना शुरू हुआ लोगो से मिलना जुलना बन्द सा हो गया । अब तो जो घर में आ जाता उसी से मिलना हो पाता था ।अम्मा व बाबूजी भी अब अस्सी से ऊपर के हो चले थे तो उनके बच्चे भी बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहे थे और उनके बच्चे यानी ह के पोते बड़े हो रहे थे किसी तरह लोन लेकर बेटे ने कार ख़रीदी और बाबू जी से कहा कि अब आपको जहाँ जाने की इच्छा हो कार द्वारा आराम से जाइयेगा । बस अब तो अम्मा बाबू जी को जैसे पंख मिल गये । दिन मे बेटे के ऑफ़िस जाने के बाद बहू और पोते के संग अम्मा बाबूजी अब जब मन होता अपने पुराने मित्रों व रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते ।उनके हम उम्र कुछ साथी तो इस दुनिया से विदा ले चुके थे और कुछ अपनें घरों में बिना क़ैद के क़ैदी की तरह रह रहे थे । एसे मे सबसे अम्मा बाबू जी को मिलवा कर बहू को बिखरी पंखुड़ियों को जोड़ने का सुख मिल रहा था और बच्चो को बुज़ुर्गों का ख़्याल रखनें के संस्कार ।
इरा जौहरी
लघुकथा
बिखरी पंखुड़ियाँ
१९/६/२०१८

