बूढ़ी माई / काव्य /बोलती  तस्वीर

बोलती तस्वीर

चित्र देख कर मन मे आया जो रच दिया वो
काव्य

जीवन की सांध्य बेला में बाँट जोहती बूढ़ी माई,
देख बाहर नन्हे बाल गोपाल खुश होती बूढ़ी माई ।

थके शरीर की निर्मल काया पर है भरा जोश पूरा ,
चलूँ बना लूँ थोड़ा हल्वा सोंचती जाती बूढ़ी माई ।

मुँह मे है अब दाँत नही वरना खाती चना चबेना।
मूँगफली दाना अब कूट कर है खाती बूढ़ी माई ।

अर्ध कुम्भ पर संगम स्नान कर आई भरे जाड़े मे ,
खिड़की पर बैठ दूर से गंगा माँ निहारती बूढ़ी माई।

अभी विश्राम कहाँ जीवन में चलो वापस अपने ठौर ,
“इरा”के द्वार ठहर कर सुस्ताती विचारती बूढ़ी माई ।

इरा जौहरी
मौलिक

बोलती तस्वीर बूढ़ी माई /काव्य 

बोलती तस्वीरचित्र देख कर मन मे आया जो रच दिया वोकाव्यजीवन की सांध्य बेला में बाँट जोहती बूढ़ी माई,देख बाहर नन्हे…

Posted by इरा जौहरी की लेखनी से on Thursday, January 31, 2019

३१/१/२०१९

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