मन के छालें
लघुकथा
मन के छालें
गहरी साँस ले कर शुभ्रा आराम कुर्सी पर बैठ कर बीते दिनों के बारे मे सोचने लगी ।इधर वह काफी बड़े झंझावत से गुजर रही थी ।जब से बड़ी नन्द ने उसे बड़े प्यार से पास बुला कर यह कहा था कि छोटी सुनो तुमको एक बात समझानी है । तुम बड़े जेठ से बात मत किया करो सब समझते हैं कि तुम्हारे उनसे गलत सम्बन्ध हैं ।सुन कर सन्न सह गयी थी वो । कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करे ।तभी वह आगे बोली कि एसा करो कि जब जेठ जी तुमसे बात किया करे तो बच्चे को चिकोटी काट कर रुला कर फिर चुपाते हुये फौरन वापस चली जाया करो । अच्छा नही लगता कि सब तुम पर शक करते है । उसने कहा कि यह गलत है और वह बड़े जेठ को बड़े भाई की तरह से ही देखती है । यह कह कर वह अपने कमरे मे चली गयी और सोचने लगी कि आगे क्या करना है ।
चुपचाप बड़ी नन्द की बात मानने की जगह उसने मन के तूफ़ान को शान्त करने के लिये सबसे पहले अपने पति से कहा कि यह बताइये कि क्या आपको हम पर किसी तरह का कोई शक है । यह सुन कर उसके पति ने कहा कि मुझे अपने बड़े भाई और तुम पर पूरा विश्वास है मुझे तो आश्चर्य होता है कि तुम एसी बात दिल मे क्यों लाई ।आज हमसे दीदी ने एसी बात कही है और यह कह कर सारी बात बता दी ।इसके बाद मन को थोड़ी शान्ति मिली । पर मन पर पड़े छाले इतने गहरे थे कि ज़ख़्म इतने से भर नहीं पाये थे ।इत्तफ़ाक़ से कुछ दिन बाद बड़ी जिठानी का घर मे आना हुआ ।मन मे ज्वालामुखी तो भरा ही हुआ था सो उनके सामने भी मन के छालें खोलकर दिखा दिये । सुनते ही वो हँसने लगीं और बोली ।अगर मुझे तुम्हारे जेठ दादा पर विश्वास नहीं होता तो मै उन्हे उनका काम नही करने देती और यहाँ तो बिल्कुल भी नहीं आने देती तुम अपने मन से सारी बातें निकाल दो ।कुछ लोगों को दूसरों के सहज रिश्ते रास नही आते। जिसके मन मे जैसी भावना होती है वह दूसरों को उसी दृष्टि से देखता है । सब सुन कर मन को बहुत शान्ति मिली ।लगा मन के छालों पर किसी ने प्यार का मरहम लगा दिया हो ।
इरा जौहरी
लखनऊ
मन के छालें
८/५/२०१८

