मुहब्बत मे उनसे मिलने की ,है बेक़रारी दिन रात
❆ ग़ज़ल सृजन – 38
❆ काफ़िया (तुकान्त) – आरी
❆ रदीफ़ (सामन्त) – इच्छा अनुसार
❆ तिथि – 01 जून 2018
❆ वार – शुक्रवार
मुहब्बत में उनसे मिलनें की ,है बेक़रारी दिन रात ।
तड़पा रहीं दूरियाँ ,है यह बेक़रारी दिन रात ।।
मजबूरियों तो देखो हमारी ,अजब है लाचारी दिन रात ।
रहना चाहूँ गिरफ़्त में ,बना बाँहों की चारदीवारी दिन रात।।
खिली है महकती रंग बिरंगी फुलवारी दिन रात ।
याद आती नहीं गुलशन मे क्या हमारी दिन रात।।
देखा किया ग़ज़ब थी ,तुम्हारी कलाकारी दिन रात ।
दीदार करना चाहती हूँ ,सूरत तुम्हारी दिन रात ।।
बड़े ज़ालिम हो जो चला करते चालें ,बन जुआरी दिन रात ।
उदास मन कह “इरा “उतारो ,अब तो अपनी ख़ुमारी दिन रात।।
इरा जौहरी
लखनऊ
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