रिश्तो का बाजार
लघुकथा
रिश्तों का बाज़ार
घर में बड़े अरमान के साथ नयी बहू आई थी सभी बहुत खुश थे चचिया ददिया ननिया सासों के साथ नन्द व देवरों की भी भीड़ थी सभी को बहू बहुत संस्कारी और सुन्दर लगी थी सबसे उसको ढेरों आशीर्वाद मिले थे पर पता नही क्या था कि बहू का मन ससुराल में लगता ही नहीं था उसका ज्यादा समय मायके में ही बीतता था ससुराल आती तो संग मे बड़ी अविवाहित बहन को लेकर आती फिर दोनो घर की सम्पत्ति आदि की जानकारी हासिल करने की कोशिश करतीं ।समय गुज़रता जा रहा था नन्हे बच्चे का भी घर में आगमन हो गया था तीन वर्ष पूरे होने पर जब उसका विद्यालय में दाख़िला कराने का समय आया तब मायके से ही बहू ने फोन कर दिया रू भेज देना यहाँ बच्चे का दाख़िला कराना है और हाँ जन्मदिन की एक पार्टी भी देनी है बहू ने जितनी रक़म माँगी बेटे ने असमर्थता प्रकट कर दी तभी उत्तर आया कि नहीं दोगे तो बेटे के पिता के नाम के आगे स्वर्गीय लगा दूँगी। रिश्तों का बाजार गर्म हो चला था बस वह पल था कि बाइक सवार बेटे का संतुलन डगमगाया बाइक सीधे सामने के पत्थर पर जा भिड़ी हैलमेट छिटक कर दूर जा गिरा और बेटा वास्तव में स्वर्गीय हो गया।पोस्टमार्टम के पश्चात पार्थिव शरीर घर मे लाया गया इत्तफ़ाक़ से उसी दिन नन्हे पोते का जन्मदिन था आँगन में पिता लेटे थे और माँ ने बाजार से जलेबी मँगा कर टीका करके अपने बेटे को जन्मदिन पर आशीर्वाद दिया और फिर पिता के पार्थिव शरीर को विदा किया गया ।बेटे के गम को जो पिता ने पोते को गले लगा कर हल्का करना चाहा बहू उसे उनकी गोद से छीन कर यह कहते हुये ले गयी कि यह हमारा बेटा है और फिर जो अपने परिवार के साथ अपने मायके गयी तो शुद्धि के दिन भी लौट कर नहीं आई ।रिश्तों के बाजार मे अब उसके लिये किसी की कोई क़ीमत ना थी ।
इरा जौहरी
स्वरचित
लघुकथा /रिश्तो का बाजार
७/७/२०१८

