सिरदर्द !
लघुकथा
सिरदर्द
मंजरी के सिर में दर्द हो रहा था घर का काम करने आई मुबीना से उसने कहा जरा सिर मे तेल लगा कर मालिश कर दो अब बातूनी मुबीना को मौक़ा मिल गया अपनी बात करके दिल हल्का करनें के लिये ।बोली दीदी एक बात बताओ ये हिन्दू मुसलमान क्या होता है सभी लोग तो एक जैसे ही होतें है वही खाना आप लोग बनाते हो और वही हम लोग खातें हैं ।मंजरी समझ गयी लगता है कुछ इसके दिल में उमड़ घुमड़ रहा है और अपनी बात पूरा किये बिना यह टस से मस होनें वाली नही ।तो शान्ति से उसकी बात सुनते हुये बोली ।”आगे बोलो बात क्या है आख़िर तुम कहना क्या चाहती हो ? “” दरअसल दीदी अभी कुछ दिन पहले हम जब गाँव जा रहे थे यहाँ रास्ते मे भंडारे से पूड़ी सब्जी ले कर टैम्पो मे चढ़ कर बच्चो को खिला रहे थे तभी एक दाढ़ी वाले ने हमसे कहा कि तुम जैसे लोग ही क़ौम का नाम डुबोते हो हिन्दुओं का प्रसाद अपने बच्चो को खिला कर मुस्लिमों की नाक कटाते हो ।”मंजरी ने कहा “फिर “ “फिर क्या हमने सुना दिया कौन सा हम किसी की लड़की भगा कर लाये हैं या चोरी की है ।बच्चो का बाप पाँच बच्चे छोड़ कर सऊदी चला गया है हम कैसे इनका पेट भरते हैं हम ही जानते हैं इस पूड़ी मे कहाँ लिखा है कि यह हिन्दू की है और मुसलमान नही खा सकते ।”गाँव की सीधी सादी मुबीना की बात सुन कर मंजरी का आधा सिर दर्द ग़ायब हो चुका था आँख खोल कर सीधी बैठ गयी और उत्सुकता से पूँछा फिर आगे क्या हुआ । “होना क्या था दीदी वहीँ टैम्पो मे दो और दीदी लोग बैंठी थी बोली अब तुम कहीँ नहीं जाओगी यहीँ बैठ कर बच्चों को खाना खिलाओ ।और वह दाढ़ी वाला फिर कुछ नहीं बोला ।और मंजरी ने अपना ज्ञान उसे बाँटते हुये कहा कि “यह हिन्दू मुस्लिम का भेद कुछ लोगो के लिये सबके दिलों में नफ़रत फैला कर अपनी जेबें भरने का तरीका मात्र है और कुछ नहीं। जाओ चाय बना लाओ हम दोनो संग संग पियेगी। “हँसते हुये संग मे चाय पीते हुये मंजरी के सिर का दर्द पूरी तरह ग़ायब हो चुका था ।
इरा जौहरी
स्वरचित
लघुकथा /सिरदर्द
१/७/२०१८

