सुरमई एक शाम
* ग़ज़ल –
* काफ़िया – आम
* रदीफ़ – तुम्हारे साथ
* तिथि – 18 मई 2018
* वार – शुक्रवार
*विधा -ग़ज़ल
*शीर्षक -सुरमई एक शाम
बन्द कमरे से निकल कर जा बैठे सरेआम तुम्हारे साथ ,
मदमस्त सुरमई सी गुज़ारी थी वह शाम तुम्हारे साथ
रहने देते तुम सदा उसी उदासी के बन्द मक़बरे मे,
गुज़ार कर चन्द लम्हा हुई बदनाम तुम्हारे साथ ।
तुमसे मिल कर ना जाने क्यूँ लगता है मन बहकने,
पर जानती हूँ होगा बुरा अन्जाम तुम्हारे साथ ।
फिर भी एक चाहत सी है कि दिल की बात कहूँ तुमसे ,
कर दे चाहे ज़माना बदनाम सरेआम तुम्हारे साथ ।
दूर रह कर कुछ ना कह कर भी तसल्ली है यही कि ,
दीवानगी मे नहीं जुड़ा “इरा” का नाम तुम्हारे साथ।
इरा जौहरी
लखनऊ
#साहित्य_सागर


