सृजन के परिप्रेक्ष्य में
सृजन के परिप्रेक्ष मे
यह जो हमारे दिल ओ दिमाग मे हर समय उमड़ता घुमड़ता रहता है अक्सर हमें चैन से ना जीने और ना मरने ही देता है । जीवन के रंगमंच पर विभिन्न दृश्यों में बिखरी हुयी घटनाओं से ही एक नयी लघु कथा कहानी या उपन्यास का जन्म होता है जीवन के परिदृश्यों की बहुत सी घटनाये लगता है हम भूल गये हैं पर ऐसा होता नही है जब लेखनी चलती है तो विचारों के द्वन्द अपने आप ही बाहर आ जाते है और एक नयी रचना का सृजन हो जाता है । एक ही परिदृश्य मे अलग अलग लोगों की भिन्न नज़रिये के कारण अलग सोंच हो सकती है पर एक दूसरी की सोंचो से भी अक्सर नया नजरिया पैदा होता है ।समाज में क्या घटित हो रहा है और वास्तव मे होना क्या चाहिये दोनो ही दृष्टिकोणों पर हमारे ख़्याल से लघुकथा या अन्य रचनाओं का सृजन होना चाहिये
इरा जौहरी
लेख
सृजन के परिप्रेक्ष्य में
११/६/२०१८
