है कोई
इरा जौहरी की लेखनी से
#काफिया_मिलाओ
दिनाँक -१५व १६ मई २०१८
विधा -ग़ज़ल
क़ाफ़िया -अता
रदीफ – है कोई
बैठी होती हूँ उदास और रोती हैं आँखें जब ,
प्यार के मीठे लफ्जो से दुलारता है कोई ।
सोती हूँ जब नींदों के स्वप्निल चिलमन मे ,
रूठे हुये ख़्वाबों को सँवारता है कोई ।
जाती हूँ जो विरह मे मिलन को दरिया मे ,
डूबती नैया को पार उतारता है कोई ।
डूबती उतराती हूँ जब इश्क के समन्दर मे ,
मुझे प्यार से जन्नत मे पुकारता है कोई।
रहती हूँ जब मदहोश उसके उसके आग़ोश में ,
बहकी सी उलझी लटों को सँवारता है कोई ।
इरा जौहरी
लखनऊ
इरा जौहरी की लेखनी से
ग़ज़ल
१५/५/२०१८


