पोखर के बराबर
लघुकथा
पोखर के बराबर
बिहार का कोलियारी का इलाक़ा जहाँ चारो तरफ कोयला ही कोयला और शराब की भट्टियाँ भी ।गाँव के लगभग सभी घरो मे देशी दारू तो बनती ही थी ।ज़्यादातर मर्द पी कर नशे में धुत्त रहते थे औरतें भी इस बुराई से दूर ना थी बहुत सी तो नशा करने मे पति का साथ भी देती थी और जो नही करतीं थी वो पति के पीने से परेशान रहतीं थी ।वहीँ ऑफीसर कालोनी मे रहने वाली मुग्धा अपने पति की इस आदत से बहुत परेशान थी ।दिन में वो वादा करते कि अब नही पियूँगा और रात में दारू चढ़ा कर आते ।
एक रात वो ऐसे ही नशे मे धुत्त आये पर घर मे पत्नी को ना पाकर सारा नशा हिरन हो गया ।पत्नी द्वारा सुबह के समय कही गयी बात याद आई कि “अगर आज पी कर आये तो मै घर छोड़ कर चली जाऊँगी अब इस घर मे या तो मै रहूँगी या यह दारू। “
वो एसे ही घर खुला छोड़ कर बाहर भागे ।घर से कुछ ही दूरी पर एक पोखर था और पोखर के बराबर पर ही एक कोयले की चट्टान पर वो उदास बैठी हुई थी ।अब वो उनसे घर चलने के लिये मनुहार करने लगे पर वो भी एक दृड़ प्रतिज्ञा के साथ वहाँ बैठी हुई थी कि या तो वह दारू घर में रहेगी या मै ।अन्त में मुग्धा के प्यार की जीत हुई जितनी भी दारू घर मे थी रात मे ही उस पोखर मे डाल दी गयी और मुग्धा ने घर मे प्रवेश किया ।वह दिन था कि उसके पति ने फिर कभी नशा नही किया ।
इरा जौहरी
स्वरचित
लघुकथा /पोखर के बराबर
१३/७/२०१८

