लघुकथा/बहू
लघुकथा /बहू
जीजी की तबियत के। बारे मे सुन कर आज जब वहाँ जाना हुआ तो देखती क्या हूँ कि जिस बहू की जीजी दिन रात कमियाँ निकालती रहती थी वो बहू उनकी जी जान से सेवा टहल मे लगी हुई है जब कि उसकी उम्र भी अब हो चली थी।बहू दामाद वाली हो गयी थी वह ।तभी देखती हूँ कभी जिसके सिर से जीजी पल्लू सरकने ही नही देती थी उस बहू की नयी ब्याहता बहू अपनी सास के साथ सहेलियों की तरह खिलखिला रही थी ।
मुझे यह सब कहाँ हज़म होने वाला था टेढ़ी नजर करके बहू को घूरा और पूँछा क्या है यह सब तुम्हारी बहू के सिर पर पल्ला नही है तो उसने मुस्कुराते हुये जबाब दिया”मैं आप लोगों की बहू हूँ जैसा आप लोगों ने चाहा वैसे रही और यह मेरी बहू है जिसमें यह सहज होगी वैसे रहेगी ।”कभी जबाब ना देने वाली बहू का जबाब सुन मैं उसका मुँह ताकती रह गयी ।
इरा जौहरी
स्वरचित
लघुकथा /बहू
३१/१०=२०१८


