सुरसतिया का सपना
“सपनों का आसमाँ “शीर्षक के अन्तर्गत लिखी लघु कथा
“सुरसतिया का सपना “
काली अंधेरी रात में खुले आकाश के नीचे रेलवे की खाली जमीन पर नाले के किनारे अपनी मड़इयाँ डाल कर रहने वाली सुरसतिया चारपाई पर अपनीं चारो बेटियों संग दो अग़ल बग़ल और दो को पाँवों के पास लिटा आँख बन्द करके अपने ट्रक ड्राइवर पति को याद करते हुये मन ही मन बतिया रही थी ।
“तुम्हारी नशा करने की लत नें हमको कहीँ का ना छोड़ा अगर तुम नशा ना करते तो आज हम सबका जीवन कुछ और ही होता सबसे बड़ी सुखिया को तुम बचपनें में बियाह गये थे तो अब उसे संभालना भी मुश्किल हो गया है ।दामाद जी जो अभी कुछ कर धर नही रहे हैं रोज ही चोरी छिपे यहाँ चले आतें हैं ।बिना दहेज के उनके घर वाले गौना करानें को तैयार नहीं है ।कुछ ऊँच नीच हुई गयी तो हम का करिबै ।बाकी तीनों अभी छोटी हैं हम बड़ी हुये बगैर कौनों का बियाह नाहीं करिबै ।हम दोनों ने मिल कर जाने कितनें सपने मिल कर देखे थे ।सपनों का एक सुन्दर आसमाँ सजाया था पर सभी सपनें अधूरे रह गये।आज अंधेरी रात में बेटियाँ चैन से सोयें इसके लिये जरूरी है कि हम रात भर खटकीली नींद सोयें ।जमाना भी अब ठीक नहीं ।कहीं हमें गहरी नींद आ जाये और किसी बिटिया को कोई राक्षस उठा ले जाये ।लचिया ,मचिया ,बुचिया तीनो ही अभी नादान हैं उन्हे जमाने की ऊंच नीच भी बतानी है ।समझ में नहीं आता कि कैसे सब संभाले ।”
अपनें आप से बतियाते हुये जाने कब सुरसतिया को गहरी नींद आ गयी ।भोर के सूरज के साथ उसकी जब नींद खुली सामने सुखिया के दूल्हा यानी अपनें दामाद को सामने पाया ।सुबह सबेरे उसे देख वह चौंक गयी तभी उसको प्रणाम करके उसने कहा कि “हमारे अम्मा बाबू बिना दहेज के गौना करानें को तैयार हो गये हैं ।साथ ही उन्होंने कहा है कि गौने के बाद भी जब चाहे हम दोनो आपके पास आ जा और रह सकतें है ।”
यह सुन कर सुरसतिया को लगा जैसे उसे #सपनों_का_आसमाँ मिल गया हो और दामाद के रूप में बेटा पा वह खुशी से निहाल हुई जा रही थी ।
इरा जौहरी
मौलिक
5/7/2019

