जानें कहाँ गये वो दिन !!!!!! चौथा भाग
जानें कहाँ गये वो दिन
हमारी तीसरी रचना
जीवन का कोई भी पड़ाव हो यादे खूबसूरत हो या दुखदाई कैसी भी हो सदा साथ रहतीं है पापा की स्थानांतरण वाली नौकरी की वजह से हमे बहुत से शहरों को करीब से देखने का मौक़ा मिला साथ ही हर शहर मे नये नये दोस्त बनाने का भी पर जल्दी किसी को दोस्त नही बनाया जा सकता तो हमारे माँ पापा ही हमारे जीवन के पक्के दोस्त रहे पापा हमारे साथ बैडमिण्टन खेला करते थे बनारस के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मैदान मे हमारे साथ दौड़ते हुये पापा ने ही हमको साइकिल चलाना सिखाया जब कि छोटा भाई अपनें आप ही छोटी सी साइकिल चलाना सीख गया माँ पापा भाई और हम चारों साथ साथ अन्ताक्षरी खेला करते थे और जब हम सब ननिहाल या ददिहाल मे इकट्ठा होते तो सब मिल कर सब अन्ताक्षरी खेला करते थे उसमे फ़िल्मी व ग़ैर फ़िल्मी गाने व चौपाई सभी गाये जाते थे बच्चो व बड़ों की अलग अलग टीमें बना करती थी आज तो जब सब मिलते है थोड़ा हाय हैलो के बाद सब अपने अपने मोबाइलों मे खो जाते है जाने कहाँ गये वो दिन ।कोँई लौटा दे मेरे बीती हुये दिन यह कह तो सकती हूँ पर नहीं कहूँगी क्यूँकि इस मोबाइल युग के अपने मजे है
रेलवे मे नौकरी करने के कारण हमारे पापा को रेल से कहीँ भी आने जाने की सुविधा प्राप्त थी साथ ही पापा को घूमने का भी बहुत शौक था हमारे चाचा जो पापा से दो साल ही छोटे हैं उन्होने पापा के साथ मिल कर पूरा दक्षिण भारत घूमने की योजना बनाई हमारे द्वारा हाइस्कूल का इम्तिहान देने के बाद हम चार और चाचा के परिवार के पाँच लोग यानी हम नौ लोग एक साथ घूमने निकल पड़े पापा चूँकि रेलवे मे गार्ड थे तो उनके पास एक गार्डबाक्स होता था और उसमे एक छोटा सा स्टोव भी हम लोग वह भी साथ ले कर गये थे चलती गाड़ी मे हम लोग आटा मॉड कर या फिर दाल चावल बीन कर तैयार कर लेते थे और फिर जैसे ही किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकती झट से हम सब उतर कर फटाफट खाना तैयार कर लेते थे और गाड़ी के चलने पर झटपट सब बटोर कर वापस ट्रेन मे ।इस पूरे सफर में जो आनन्द आया वह जीवन मे हम आज तक नहीं भून पाये दक्षिण के मीनाक्षी मन्दिर मे रात के समय जब मन्दिर के बाहर चप्पल उतार कर गये और लौटने पर चप्पल ग़ायब जो घर मे कभी नंगे पैर नहीं चलते थे वहाँ ताज़ी बारिश से भीगी सड़क पर चप्पल की दुकान की खोज मे दूर तक नंगे पैरों चलना हमें कभी नहीं भूलता
माँ पापा के साथ हम बहुत घूमे और जीवन को बहुत ज़िन्दादिली के साथ जिया आज पापाअस्सी से ऊपर और माँ अस्सी के करीब है वो ज्यादा चल फिर नहीं सकते पर कहीँ घूमने के लिये जाना हो तैयार हो जाते है उनकी जिन्दादिली मे कोई कमी नही आई है बस अशक्त हो गये है तो उनके दोनो नाती कार से उनकी मनपसन्द जगह पर ले जाते है उनको देख कर लगता है कभी कितने सशक्त थे दोनो आज कितने अशक्त हो गये हैं जाने कहाँ गये वो दिन क्या फिर से उनकी आवाज मे फिर से वो पुरानी बुलन्दी आ पायेगी जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे है
इरा जौहरी



