एकान्त नहीँ अकेलापन
लघुकथा
एकान्त नहीं अकेलापन
रिटायरमेण्ट के बाद भी बाबूजी काफी चुस्त दुरुस्त रहे।उन्होंने घर पर ही कुछ बच्चों को पढ़ाना शुरु कर दिया था।बच्चो की भी सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा चुके थे।ऊँचे पद से रिटायर हुये थे तो पेन्शन भी अच्छी मिलती थी ।स्वस्थ रहने के लिये उन्होंने ने स्वयं को व्यस्त रखा हुआ था पर इधर वो काफी थकान महसूस करने लगे थे तो सबके यह कहने से कि “अब सब बन्द करके आराम करिये और पढ़ाने का शौक है तो घर के बच्चों को पढ़ाइये “धीरे धीरे करके सब बन्द हो गया और नन्हे बच्चे भी बड़े हो गये । अब उन्होने पूरी तरह से बिस्तर पर रहना शुरु कर दिया ऐसे मे बेटों बहुओं और बच्चों से भरा घर होने पर भी उनका अकेलापन घर में बढ गया था हलाँकि सब थोड़े थोड़े समय पर कमरे में झाँक कर उन्हे देख जाते थे जब वो जग रहे होते थे सब उनके पास आ कर बैठते थे पर अब वो अक्सर आँख बन्द करके पड़े रहते थे जिससे बाकी लोगों के कार्यों मे व्यवधान ना पड़े ।अब भरे पूरे घर मे उनकी जिन्दगी मे एकान्त तो नही था पर अकेलापन बहुत था ।
इरा जौहरी
स्वरचित

