परिन्दों का घर
लघुकथा
परिन्दों का घर
ये परिन्दे भी कई तरह के होते है कुछ तो अपने रहने के लिये बहुत सुन्दर घर बनाते हैं तो कुछ तिनके जोड़ कर बस रहने लायक ही बना लेते हैं तो कुछ इतने चालाक होते है जो मौक़ा ताक कर चौका लगा लेते हैँ यानी जरूरत पड़ने पर दूसरों से अपना काम भी निकल लेते हैं और जबरिया दूसरों के घरों मे क़ब्ज़ा भी जमा लेते हैं ।देखा जाये तो हम इंसान भी कुछ इसी तरह के होते है कुछ कलाकार गुनी तो कुछ दूसरों पर आधिपत्य ज़माने वाले ।तो आज मैं एक इंसानी परिन्दे के विषय मे कुछ कहने जा रही हूँ और उस परिन्दे की श्रेणी का निर्णय आप पाठकों पर छोड़ देती हूँ ।
कई मंज़िला ऊँची बिल्डिंग के पास झुग्गी मे रहने वाली सविता आज बहुत खुश थी कि आज मालकिन ने उसे अपने फ़्लैट मे एक कमरा उसे रहने के लिये दे दिया था बदले मे उसे घर के सब काम करनें थे आमदनी के लिये उसने पास ही मे एक नौकरी ढूँढ ली थी ।सुकून से जीने के लिये उस परिन्दे को एक घर मिल गया था ।मालकिन को एक हाथ बँटाने का सहारा मिल गया था सभी खुश थे ।तभी एक दिन आधी रात के समय मालकिन की नींद खुली पास मे बेटे के कमरे से कुछ आवाज़ें आ रहीँ थी उक्सुक्तावश झाँका तो पाया सविता बेटे के साथ थी । उनके तो पैरों से जैसे धरती ही खिसक गयी । सर पकड़ कर वापस कमरे मे आईं । सुबह का इन्तजार करने लगीं । चाय के बाद उन्होंने बेटे को कमरे मे बुला कर सब पूँछा । तो जो बेटे ने कहा वह सुन कर वह दंग रह गयी । बेटे ने कहा कि मैने आपसे कितनी बार कहा था कि मुझे अनाथ मिताली से विवाह करना है पर आप मानती ही नहीं थी आपके मन मे बसने के लिये ही यह तरीका अपनाया ।अब कहो माँ सविता यानी मिताली आपको पसन्द है ना आपकी एक हाँ से उसको भी एक घर मिल जायेगा । और मालकिन ने हाँ कह कर उस परिन्दे को घर दे दिया ।
इरा जौहरी
परिन्दों का घर
११/६/२०१८

