बोलती तस्वीर -गद्य व पद्य
*बोलती तस्वीर
*वार -सोमवार
*तिथि – १२/२/२०१८
बाँस पर चलना कितना मुश्किल होता है कोई नही समझता पेट की ख़ातिर सब करना पड़ता है ।नृत्य करते समय दिखावटी अच्छे कपड़े पहनने पड़ते है वरना तो ना रहने को घर है और ना ही सर पर छत ,वो तो भला हो कि पुश्तैनी कला का जो आज पेट भरने के काम आ रही है एक बात तो है इन शहरो मे अंजान आदमी पर भरोसा करके कोँई काम तो नही देता पर हुनर देख कर खुश हो कर पैसा जरूर दे ते है जिससे कुछ हो ना हो भूखे पेट सोना नही पड़ता सर पर छत भले ही ना हो पर अपने हुनर पर इतना भरोसा तो अब हो गया है कि अबकी कुछ पैसा जोड़ कर गाँव जरूर भेज पाऊँगा
इरा जौहरी
लखनऊ
बोलती तस्वीर
12/2/2018
दिन सोमवार
हम हैं छौने ऐसे माँ बाप के ,
गुजारी जिन्दगी सदैव आसमान के नीचे,
हर मौसम को झेला फुटपाथ पर।
देश तरक्की करता गया ,
सड़के चौड़ीहोती गयीं,
और हमारी भी प्रगति हो गयी,
सड़कों के बीच मे हमारा पलँग सजा दिया,
जगह बदल गयी हमारी पर नियति न बदली,
अरे विकास करने वालों,
,तुुम्हारे चेहरे तो बदलते रहे,
पर न बदल पाया देश का चेहरा।
हमारे मामा आदर्श सुधा सक्सेना जी की लेखनी से
बिल्हौर
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