हवा का रुख़
लघुकथा
हवा का रुख़
नौकरी के कारण विदेश में रह रहे बेटे से माँ ने घर में आने पर कई बार घर की जर्जर होती दीवारों का ज़िक्र किया परन्तु हर बार अनसुना कर के वह चला जाता था आख़िर में माँ ने सब कहना छोड़ दिया ।इस बार घर आनें पर बेटे ने सारे घर की मरम्मत बिना कहे ही करा दी माँ को आश्चर्यमिश्रित खुशी हुई पर बोली कुछ नहीँ ।बेटे की बातों से पता चला कि हाल में ही किसी सहयोगी को नौकरी से निकाल दिया गया तो उसनें रहने के लिये पैतृक आवास चुना क्योंकि विदेश की नौकरी मे धन तो वह बहुत कमा ही चुका था और वहाँ अपनें घर मे सुकून से जीने के साथ माता पिता की देखभाल भी आसानी से करना संभव था ।सही संगत के कारण हवा का रुख़ बदल चुका था ।
इरा जौहरी
हवा का रुख़
१८/६/२०१८

