थोथा नारा
लघुकथा
थोथा नारा——
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” का ज़ोरदार नारा फेसबुक पर चल रहा था इसका असर साहित्यिक रचनाओं वाले समूहों की रचनाओं की पोस्ट में भी दिख रहा था ।साथ ही नन्ही बच्ची के साथ बलात्कार की घटना ने तो सभी को जैसे हिला ही दिया हो ।ऐसे में मुनिया की माँ भी किसी से पीछे ना थी एसी किसी भी पोस्ट के आने पर वह सबसे पहले शेयर करनें की कोशिश करती ।वह फेसबुक पर जुटी हुई थी कि तभी दरवाज़े को जोर जोर से खटखटानें की आवाज आई पड़ोसन बड़े मार्मिक तरीके से रोते हुये दरवाज़े पर खड़ी थी बोली भाभी हमें बचा लो कुछ गुन्डे हमारे पीछे पड़े हुये हैं उनसे बच कर किसी तरह से गाँव से भाग कर छिप छिपा कर यहाँ चैन से रह रहे थे जाने कैसे उन्हे हमारे यहाँ होने की ख़बर लग गयी अभी इनका फोन आया है कि कहीँ जा कर छिप जाओ तो बड़ी आशा से आपके पास आयें हैं सारी बात सुन कर मुनिया की माँ ने यह कहते हुये भड़ाक से दरवाज़ा बन्द कर लिया कि हमारे घर भी बेटी है ।
इरा जौहरी
स्वरचित
लघुकथा /थोथा नारा
७/७/२०१८

