लक्ष्य भेद !! (१)
लघुकथा
लक्ष्यभेद
लाला मनसुखराम दौलत से बहुत प्रेम होने के कारण दौलत इकट्ठी करने के लिये हर सही गलत तरीका आज़माने के लिये तैयार रहते थे ।ईश्वर ने दुश्मनी निभाते हुये उन्हे दो कन्याओं का बाप बना दिया था ऐसा उनका मानना था पर हार मानना उन्होने सीखा ना था ।बड़ी बेटी ब्याह योग्य होने पर वो ललाइन के जोर देने पर उपयुक्त पात्र की तलाश में निकले ।
आख़िर में एक लड़का उन्हे पसन्द आया जो संयुक्त परिवार की ऊँची हवेली में अपने माता पिता की इकलौती औलाद था।जिसके माता पिता अब नही रहे थे तो वह चचेरे भाइयों संग रहता था ।लड़के वालों को दहेज की कोई चाहत ना थी बस गुणी व संस्कारी बहू चाहिये थी ।फिर क्या था आनन फ़ानन में रिश्ता तय कर आये ।जिन्दगी में खुद की मेहनत से तो वह ज्यादा कमा नही पाये थे सोचा चलो पैसे वालों से रिश्तेदारी हो गयी ।
शुभ समय पर दोनो का विवाह सम्पन्न हो गया ।विधि का विधान कोई टाल नही पाया है तो कुछ एसा हुआ कि अचानक हुये हादसे से लड़के की मौत हो गयी ।लाला जी ससुराल जा कर अपनी बिटिया को वापस बुला लाये और सबसे लड़ भिड़ कर दामाद की सम्पत्ति बेटी के नाम करा कर सब ले आये ।धीरे धीरे बेटी से यह कह कर तुम सब संभाल नही पाओगी उसकी सारी सम्पत्ति उन्होने अपने नाम करा ली ।अब अपनी बेटी के प्रति भी उनका रवैया बदल चुका था उसको वो दिन भर कोसते और नौकरानी की तरह काम लेते थे ।
छोटी बहन से यह सब देखा ना जाता था ।अपने ब्याह के बाद उसने पिता की गलत बातों का विरोध करते हुऐ अपनी बड़ी बहन का विवाह उसके योग्य व्यक्ति से करा कर उसका जीवन सुखमय बना दिया ।
इरा जौहरी
लघुकथा /लक्ष्यभेद
१३/७/२०१८

