एक नयी सुबह!!
लघुकथा
एक नयी सुबह
मास्टर ज़ोरावर लाल आँख बन्द करके आराम कुर्सी पर बैठे हुये थे ।यादें थीं कि पीछा ही नही छोड़ रहीँ थी।आज दीपावली के दिन बेटा बहुत याद आ रहा था ।अभी कुछ ही समय तो हुआ था उसकी आकत्समिक मौत का ।
समय का पहिया बीते दिनो की सुखद यादों में दौड़ने लगा कि कैसे एक बेटा और एक बेटी वाला उनका सुखद परिवार था बेटी बड़ी थी तो उसकी शादी उन्होने पहले ही कर दी थी। जबकि बेटे की शादी रजिस्ट्रार ऑफ़िस मे नौकरी लगने के बाद की थी आदर्शवादी होने के कारण विवाह मे उन्होंने दहेज भी नही लिया था और खुले विचारों के होने के कारण विवाह के पश्चात बहू को फौरन ही बेटे के साथ शहर भी भेज दिया था ।
वहीं शहर में तबियत खराब होने पर अस्पताल में ही बेटे की मौत होने पर सब लोग बेटे के साथ घर आये और अन्तिम क्रिया के पश्चात सबके वापस जाने पर बहू भी पिता व भाई के साथ मायके चली गयी ।अभी बेटे की मौत के बाद शुद्धि भी नहीं हो पाई थी कि पता चला कि बहू ने बेटे की जगह नौकरी के लिये आवेदन भी भेज दिया है ।साथ ही घर आ कर सम्पत्ति के ब्योरे के साथ हिस्सा भी माँगने लगी ।मना करने पर बहू ने बुरी तरह उनको अपमानित करके यह कहते हुये कि संपत्ति तो मै सब ले कर ही रहूँगी मुँह पर चाँटा भी मार दिया था ।इन सब घटनाओं के घटित होने पर वो बुरी तरह सहम से गये थे ।उन्होंने अपना विवेक ना खोते हुये बेटे के सभी कर्म करके तुरत फुरत अपनी समस्त सम्पत्ति औने पौने दाम मे बेच दी और बेटी के पास रहने के लिये आ गये ।
आज दीपावली की शाम थी ।बेटी पिता को दीपावली पूजन व दिये जलाने के लिये बुला रही थी ।अंधेरा छँट चुका था चारो ओर दिये की रोशनी जगमगा रही थी नाती और नातिन संग दामाद जी व बच्चो की नानी को पूजा के बाद फुलझड़ी भी तो छुड़ानी थी ।
इरा जौहरी
स्वरचित
एक नयी सुबह
१३/७/२०१८

