५))जिन्दगी यूँ ही बीत जाती है निभाने में !!
.गजल
#काफ़िया_मिलाना
दिनांक – 12 जुलाई 2018
जिन्दगी यूँ ही बीत जाती है निभाने मे
कुछ बात अधूरी रह जाती है वीराने मे
नसीब में हमारे यूँ ही गम है बहुत सनम
फिर क्यूँ मजा आता है मुझको सताने मे
जो आई आज फिर मीठी ख़ुमारी मुझको
यादों के दरमियाँ गुजरी रात मुझे रुलाने मे
खिलौना जान कर दिल अपना बहलाते हो
इजहार ऐ यार के और भी गम हैं जमाने मे
कहे “इरा “वक्त ना अपना जाया करो
मुहब्बत की सोयी हुई यादो को जगाने मे
★ #मोमिन जी द्वारा लिखित पूरी ग़ज़ल★
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हम समझते हैं आज़माने को।
उज्र कुछ चाहिए सताने को।
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सुबहे-इशरत है न वह शामे-विसाल,
हाय क्या हो गया ज़माने को।
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बुलहवस रोये मेरे गिरियाँ पे अब,
मुँह कहाँ तेरे मुस्कुराने को।
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बर्क़ का आसमाँ पर है दिमाग़।
फूँक कर मेरे आशियाने को,
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रोज़े-मशहर भी होश अगर आया,
जायेंगे हम शराबख़ाने को।
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कोई दिन हम जहाँ में बैठे हैं,
आसमाँ के सितम उठाने को।
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संग-ए-दर से तेरे निकाली आग,
हमने दुश्मन का घर जलाने को।
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चल के का’बे में सिजदा कर ‘मोमिन’,
छोड़ उस बुत के आस्ताने को।
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#शब्दार्थ:
उज्र = बहाना
सुबहे-इशरत = सुखद सुबह
बुलहवस = लालच का खेल
संग-ए-दर = दरवाज़े का पत्थर, चौखट
आस्ताने = द्वार, दरवाज़ा
गजल/जिन्दगी यूँ ही बीत जाती है निभाने मे
१२/७/२०१८


