यादें बनारस की
यादें बनारस की
मजेदार यादगार क़िस्सा !!
सब कुछ तब तक मजेदार लगता है..
जब तक वो दूसरे के साथ होता है…!!
फेसबुक के पन्ने पलटते हुये सखि “रेनू दुबे “जी की लिखी पंक्तियों पर जो नज़र गयी तो अचानक बचपन का वह क़िस्सा याद आ गया और होंठों पर बरबस मुस्कान तैर गयी ।
तो हुआ वह यूँ था कि उस वक्त हम लोग बनारस यानी आज की वाराणसी मे रहा करते थे ।वहाँ बन्दरो का साम्राज्य बहुत फैला हुआ है ।वहाँ हमारे घर के पीछे एक विशाल गूलर का पेड़ था जिसकी शाखायें हमारे घर की छत के ऊपर फैली हुईं थी उस पर अक्सर ही बहुत से बन्दर विराजमान रहते थे ।
एक सुबह देखते क्या हैं कि एक बन्दर अण्डा फोड़ कर खा रहा था ।माँ और भाई के साथ पड़ोसियों को भी आवाज दे कर बुला कर दिखाया हम लोग ताली बजा कर खूब हँसे ।हमारे देखते देखते उसने कई अण्डे फोड़े और खाये ।
माँ के शाकाहारी होने की वजह से हमारे घर मे अलग से उँचाई पर अण्डे टाँगे जाते थे और मै ही पापा के साथ मिल कर कुछ बनाया करती थी ।थोड़ी देर में जब पापा के साथ मै अण्डे से कुछ बनाने चली तो देखती क्या हूँ कि वहाँ तो अण्डे थे ही नही।यह देख कर पहले तो मन दुखी हो गया पर फिर हँसी भी बहुत आई कि हम लोग बन्दरों को अपने ही घर के अण्डे खाते देख कर खुश हो रहे थे मजे की बात उस घटना को हमने पड़ोसियों को भी बुला कर दिखाया था ।
इरा जौहरी
स्वरचित
यादें बनारस की
सब कुछ तब तक मजेदार लगता है..
जब तक वो दूसरे के साथ होता है…!!
१८/७/२०१८

