सूरज के छिपने तक
लघुकथा
सूरज के छिपने तक
बहुत दिनों से चाहत थी गाँव जाने की ।बाग़ों मे पेड़ से तोड़ कर आम खाने की ।आज वो तमन्ना भी पूरी हो गयी जब दीनू के बेटा होने पर रामधीन काका के सोने की सीढ़ी चढ़ने की ख़बर गाँव से आई । राधिका भी परिवार के साथ वहाँ पँहुची ।बचपन की सखियों से मिल कर गाँव की पुरानी गलियों मे घूम कर जो खुशी मिली वह शहर के मॉल और पार्कों मे कभी नहीं मिली । शाम के समय घर के पीछे की आम की बगिया मे पँहुचने पर वहाँ पर ढलते सूरज का दृश्य मन को मोह गया। सभी मनोरम दृश्यों को कैमरे मे क़ैद करके वह सूरज के छिपने तक वापस शहर की ओर लौट चली ।
इरा जौहरी
सूरज के छिपनें तक
१०/५/२०१८

