लघुकथा /निर्माण चाक का
लघुकथा /निर्माण चाक का
गणतन्त्र दिवस और जलेबी
वो दोनो देवरानी जिठानी थी।बच्चे अक्सर उनका यह कह कर मज़ाक़ उड़ाते थे कि अलग अलग पूछों तब भी दोनो एक ही बात कहेंगी तो वाक़या यूँ है कि गणतन्त्रदिवस के शुभ अवसर पर जिठानी की बिटिया का जन्मदिन भी पड़ता था तो देवरानी एक दिन पहले ही बच्चो के संग आ धमकती थी आख़िर वो उसकी भी लाड़ली थी ।सुबह के नाश्ते मे तय हुआ कि जलेबी खस्ता मँगाये जाये ।मँगा तो लिये गये पर वो बच्चो को यह बताना भूल गये कि कितने मँगाये जाये ।बच्चे भी ऐसे कि दुकान पर जा कर खस्ते तो गिन कर ले आये पर जलेबी जितनी दुकानदार ने दे दी उतनी ले आये ।घर आने पर दोनो ने एक साथ उनसे कहा खाने वाले छ: लोग उनमे से दो मधुमेह के शिकार बचे चार लोग और ले तुम लोग किलो भर जलेबी ले आये कौन खायेगा ।बच्चो ने मासूमियत से कहा कि हमनें जलेबी माँगी थी ।दुकानदार ने जितनी दे दी उतनी ले आये ।अब क्या किया जाये ।देवरानी जिठानी दोनो एक साथ बोल पड़ी एसा करो जितनी खानी हो उतनी निकाल कर बाकी सब ले जा कर उन लोगो के बीच बाँट आओ जो इसके स्वाद के लिये तरसते हैं ।
बड़ो की बात मान कर बच्चे जलेबी लेकर निकल पड़े और जब वो वापस घर पँहुचे उनसे पूँछा गया कहो कैसा अनुभव रहा ।बच्चे चहकते हुये बोले खुद खाने से ज्यादा मजा बाँटने मे आया ।जब हम मंदिर के बाहर जलेबी देने पँहुचे उस समय तो पाँच छ: ही बच्चे थे पर फिर और भी आ गये ।और फिर हमे जलेबी बाँटता देख कुछ रिक्शावाले भी आ गये ।बहुत अच्छा लगा ।आगे से हम ऐसा अक्सर ही किया करेंगे ।और दोनो देवरानी जिठानी अभिभूत हो कर भविष्य के चाक के निर्माण को देख रहीँ थी
इरा जौहरी
मौलिक
लघुकथा / निर्माण चाक का
गणतन्त्र दिवस और जलेबी
२६/१/२०१९

