अनकहा दर्द
बोलती तस्वीर/लघुकथा
अनकहा दर्द
कौन सा मुखौटा अपने चेहरे पे लगाऊँ ।घरेलू सीधी सादी महिला का मुखौटा लगाती है तो घरेलू हिंसा जीने नही देगी और यदि बाज़ारू औरत का मुखौटा पहनती है तो सभ्य समाज के सफ़ेदपोश नोंचने आ जायेंगे।किसी कड़क अधिकारी का मुखौटा धारण करती है तो भ्रष्टाचार का दैत्य हावी हो जायेगा ।सरकारी चिकित्सिका बन यदि समाज सेवा करना चाहती है तो अपनी ही प्रजाति को जन्म से पूर्व ही मारने के अपराध के लिये ज़बरन ढकेली जायेगी ।उसे क्या करना है कौन सा मुखौटा पहनना है यह अधिकार भी तो समाज उसे मन से देना नही चाहता । आज फिर जीवन के चक्रव्यूह में खड़ी वह किंतव्यविमूढ हो सोंच रही है कि क्या वह असमंजस मे खड़ी खड़ी ही अपनें अनकहा दर्द के साथ दम तोड़ देगी ।
इरा जौहरी इरा
मौलिक
लघुकथा /अनकहा दर्द
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१०/२/२०१९


