गजल/जानू ना मैं
❆ ग़ज़ल सृजन – 54
❆ काफ़िया (तुकान्त) – अल
❆ रदीफ़ (पदान्त) – स्वेच्छानुसार
❆ तिथि – 13 फरवरी 2019
❆ वार – बुद्धवार
जिन्दगी किस राह पर रही है चल जानू ना मैं ,
तेरे दीदार के लिये कैसे करूँ पहल जानू ना मैं ।
अँधियारी काली रात में डोला फिरती अकेली ,
सुख का सबेरा होगा कब मुकम्मल जानू ना मैं।
छायी है धरा पर बरसने को आतुर घनघोर बदरी ,
छिटकेंगे कब गगन से दुख के बादल जानू ना मैं ।
देखा है फिर नन्हे पौधों को तक़दीर से लड़ते हुये,
कब होगा इनका जीवन सहज सरल जानू ना मैं ।
मसली गयी है एक नन्ही कली कमजोर कोख में ,
कब जागेगा हर इंसान हो कर विकल जानू ना मैं ।
इरा जौहरी
लखनऊ
गजल/जानू ना मैं
१३/२/२०१९



